ऑनलाइन पेमेंट प्रणाली:  जनता को विश्वास में लेने की जरूरत 

साइबर अपराध से निपटना बड़ी चुनौती

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Dec 08, 2016
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केंद्र सरकार विमुद्रीकरण के बाद ऑनलाइन भुगतान व वित्तीय व्यवहारों को प्राथमिकता देने में लगी है ताकि कालेधन से निपटा जा सके लेकिन देश में बढ़ते साइबर अपराध और हैकिंग के मामले से जनता संशय में है कि क्या उनकी जमा-पूंजी सुरक्षित रहेगी। इस संदेह को पुख्ता करने वाली कई घटनाएं रोजाना दर्ज होती हैं।

साइबर अपराध के प्रति अचेत जनता को आसानी से ठग लिया जाता है। उनके मोबाइल नम्बर से कार्ड नम्बर, अन्य विवरण और यहां तक की वन टाइम पासवर्ड (ओटीपी) भी हासिल कर लिया जाता है। महानगर में इस तरह की बैंकिंग धोखाधड़ी की कई शिकायतें बैंकों को मिलती रहती है। यही वजह है कि वे अक्सर मोबाइल पर ग्राहकों को अलर्ट करते हैं लेकिन ऐसी वारदातें नहीं रुकती। प्लास्टिक मनी और ऑनलाइन बैंकिंग व्यवहारों को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए देश में उपयुक्त वातावरण व बुनियादी संरचना तैयार करने की जरूरत है ताकि जनता को यकीन हो जाए कि वे ठगे नहीं जाएंगे।

बढ़ता ऑनलाइन फ्रॉड
विशेषज्ञों की मानें तो हर 10 में से 7 व्यक्ति ऑनलाइन फ्रॉड के शिकार होते हैं। इनमें सोशल नेटवर्किंग के प्रोफाइल हैक किए जाने के मामले भी शामिल हैं। ये मामले सरकार और लोगों के लिए गंभीर चेतावनी है। ऑनलाइन पेमेंट गेट वे पर आगे बढऩे से पहले सरकार और आरबीआई को इस पर गहन चिंतन करना होगा। आरबीआई को सबसे पहले एक कड़ा कानून बनाना होगा कि बैंक अपने ग्राहकों का विवरण किसी दूसरे व्यक्ति व संस्थान को नहीं दें। सबसे अहम बात डेटा को सुरक्षित रखने की है। सभी बैंकों की कार्यप्रणाली और सॉफ्टवेयर सिस्टम अलग-अलग होती है इनमें भी एकरूपता लाने की जरूरत है। साथ ही जनता में भी इसके प्रति जागरूकता लानी होगी कि उनके खाते और बैंकिंग प्रणाली में सेंधमारी नहीं हो सकती।


सुरक्षा बड़ा सवाल
सरकार की घोषणा से पहले भी कई लोग इन ऑनलाइन पेमेंट गेटवे का इस्तेमाल करते थे लेकिन यह न तो उस वक्त इतना सुरक्षित था और न अब है। ऑनलाइन धोखाधड़ी से निपटने के लिए सरकार के पास न कोई उचित कानून है और न ही लोगों में इन कानून के प्रति उतनी जागरूकता। इसके लिए विविध विभागों में आपसी तालमेल जरूरी है। भारत में केवल 10 प्रतिशत लोगों को ही पता है कि साइबर क्राइम क्या है?

डा. एस. अमर प्रसाद रेड्डी, अपर महानिदेशक, नेशनल साइबर सेफ्टी एंड सिक्योरिटी स्टैंडर्ड


ठोस कानून की जरूरत
साइबर क्राइम से निपटने के लिए हमारे देश में कोई ठोस कानून नहीं है। जो कानून है वह हाथी के दिखने वाले दांतों की तरह है। उदाहरण के तौर पर चेन्नई में बैठा व्यक्ति अन्य राज्य के साइबर अपराधी का शिकार होता है तो उसे ट्रेस करने और कार्रवाई करने की मजबूत व्यवस्था का अभाव है। पुलिस भी इन मामलों की पड़ताल में उदासीनता दिखाती है जिससे अपराधियों के हौसले बढ़ते हैं। कई मामले तो दर्ज ही नहीं होते। साइबर अपराधों के लिए केंद्र और राज्य सरकार को मिलकर एक सशक्त कानून और कार्यप्रणाली विकसित करनी होगी। यह कार्य एक नोडल एजेंसी कर सकती है जिसका कार्य आपराधिक गतिविधियों पर निगाह रखना और अपराधियों की धरपकड़ होगा।
वरिष्ठ अधिवक्ता पी. विल्सन, मद्रास उच्च न्यायालय


रीतेश रंजन @ चेन्नई
Published on:
08 Dec 2016 08:53 pm
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