बकस्वाहा, बड़ामलहरा और बिजावर जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्रों के लिए महुआ का यह डेढ़ महीना किसी उत्सव से कम नहीं होता, क्योंकि यह बिना किसी निवेश के ग्रामीणों की झोली खुशियों और नकदी से भर देता है।
बुंदेलखंड के पथरीले रास्तों और घने जंगलों में इन दिनों एक खास महक घुली हुई है। यह महक है महुआ की, जिसे स्थानीय ग्रामीण 'प्रकृति का वरदान' और पीला सोना कहते हैं। मार्च के दूसरे सप्ताह से शुरू हुआ यह सीजन अब अपने अंतिम पड़ाव यानी अप्रेल के अंत की ओर है। बकस्वाहा, बड़ामलहरा और बिजावर जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्रों के लिए महुआ का यह डेढ़ महीना किसी उत्सव से कम नहीं होता, क्योंकि यह बिना किसी निवेश के ग्रामीणों की झोली खुशियों और नकदी से भर देता है।
महुआ सिर्फ एक फल या फूल नहीं, बल्कि ग्रामीणों के लिए एक फिक्स्ड डिपॉजिट की तरह है। महुआ बेचकर जो पैसा मिलता है, उससे ग्रामीण साल भर का अनाज खरीदते हैं, कर्ज चुकाते हैं और घरों में होने वाले शादी-ब्याह के खर्चों का इंतजाम करते हैं। ग्रामीण रमेश आदिवासी का कहना है कि मौसम की अनुकूलता के आधार पर उत्पादन कम-ज्यादा होता रहता है, लेकिन यह कभी खाली हाथ नहीं लौटाता। यह प्रकृति की वह संपत्ति है जिसके लिए किसी पूंजी की आवश्यकता नहीं पड़ती।
महुआ की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूरी तरह कुदरती खेती है। ग्रामीणों के अनुसार, क्षेत्र में महुआ के लाखों पेड़ हैं जिनकी कोई आधिकारिक गिनती तो नहीं है, लेकिन इनसे होने वाला उत्पादन करोड़ों में पहुंचता है। यहां के किसान इसे हल-बैल की खेती जैसा मानते हैं, जिसमें नुकसान की गुंजाइश शून्य है। ग्रामीण तडक़े सुबह ही सपरिवार जंगलों की ओर निकल जाते हैं। पेड़ से टपकने वाले महुआ के फूलों को इकठ्ठा किया जाता है, फिर उन्हें कड़ी धूप में सुखाया जाता है। सूखने के बाद इसकी बिक्री से ग्रामीणों को जो मुनाफा होता है, वह उनकी साल भर की कई जरूरतों को पूरा करता है।
बुंदेलखंड के इन क्षेत्रों की सबसे बड़ी समस्या पलायन है। रोजगार की तलाश में यहां के युवा अक्सर दिल्ली, पंजाब या गुजरात की ओर रुख करते हैं। लेकिन महुआ का सीजन आते ही पलायन का यह पहिया थम जाता है। होली के आसपास घर लौटे ग्रामीण मई के पहले सप्ताह तक गांव में ही रुकते हैं। स्थानीय युवती अंजलि बताती हैं, महुआ हमारे लिए अनमोल है। इस सीजन में हम गांव में रहकर ही इतना कमा लेते हैं कि परिवार के राशन-पानी का जुगाड़ हो जाता है। सीजन खत्म होते ही हमें फिर से परदेश की ओर देखना पड़ता है।
जंगलों से महुआ बीनना जितना आसान दिखता है, असल में उतना ही चुनौतीपूर्ण है। सुबह अंधेरे में जंगली जानवरों के डर के बीच महुआ इकठ्ठा करना और फिर उसे कई दिनों तक धूप में सुखाकर नमी मुक्त करना एक धैर्यपूर्ण कार्य है। सुखाने के बाद महुआ का वजन कम हो जाता है, लेकिन इसकी कीमत बढ़ जाती है। फिलहाल मंडियों और स्थानीय व्यापारियों के पास महुआ की आवक जोरों पर है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था में नई जान आ गई है।