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दो किलोमीटर दूर जंगलों की झिरिया से ला रहे पीने का पानी, विवाह संबंधों पर भी पड़ने लगा जलसंकट का असर

बकस्वाहा और आसपास के क्षेत्रों में पानी की भीषण कमी के कारण अब शादियां तक टलने लगी हैं। लोग इन गांवों में अपनी बेटियों का विवाह करने से कतरा रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि उनकी बेटियों का पूरा जीवन केवल पानी के इंतजाम में ही बीत जाएगा।

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झिरिया से ला रहे पीने का पानी

जिले में इस समय भीषण गर्मी और जल संकट ने आम जनजीवन को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त कर दिया है। जैसे-जैसे पारा 43 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच रहा है, ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की किल्लत एक त्रासदी का रूप लेती जा रही है। विडंबना यह है कि प्रशासन की नाक के नीचे, जिला मुख्यालय से महज 3 से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गौरैया और पठापुर जैसे गांवों की स्थिति भी अत्यंत दयनीय है। यहां की करीब 1200 से 1500 की आबादी पीने के पानी के लिए रोजाना 1 से 2 किलोमीटर का पथरीला सफर तय करने को मजबूर है। सरकारी फाइलों में दर्ज विकास के सुनहरे आंकड़ों के विपरीत इन गांवों में लगे अधिकांश हैंडपंप या तो सूख चुके हैं या महीनों से सुधार की बाट जोह रहे हैं।

शादियां टलीं और बढ़ रहा पलायन

जल संकट का असर अब केवल प्यास तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने को भी चोट पहुंचा रहा है। बकस्वाहा और आसपास के क्षेत्रों में पानी की भीषण कमी के कारण अब शादियां तक टलने लगी हैं। लोग इन गांवों में अपनी बेटियों का विवाह करने से कतरा रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि उनकी बेटियों का पूरा जीवन केवल पानी के इंतजाम में ही बीत जाएगा। मूलभूत सुविधाओं के इस अभाव में बड़ी संख्या में ग्रामीण परिवार खेती-किसानी और पशुपालन छोडकऱ रोजगार की तलाश में महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं। ग्राम गौरैया के कुछ संपन्न परिवारों ने निजी तौर पर पानी स्टोर करने के लिए टैंक तो बनवा लिए हैं, लेकिन उन्हें भरवाने के लिए 300 से 500 रुपए खर्च कर निजी टैंकरों का सहारा लेना पड़ रहा है, जो गरीब परिवारों की पहुंच से बाहर है।

गंदा पानी पीने की मजबूरी

जब सरकारी जल स्रोत पूरी तरह जवाब दे गए, तो ग्रामीणों ने अपनी प्यास बुझाने के लिए खतरनाक रास्ते चुन लिए हैं। किशनगढ़ क्षेत्र के ग्रामीण अब जंगलों में स्थित झिरिया से रिसने वाला गंदा और मटमैला पानी छानकर पीने को विवश हैं। चिंताजनक पहलू यह है कि इसी झिरिया से जंगली जानवर और मवेशी भी पानी पीते हैं, जिससे गाँवों में गंभीर संक्रामक बीमारियों के फैलने का खतरा ब? गया है। इस संकट ने बच्चों के बचपन पर भी प्रहार किया है; स्कूल जाने की उम्र वाले बच्चे पढ़ाई छोडकऱ चिलचिलाती धूप में अपने माता-पिता के साथ पानी ढोने में मदद कर रहे हैं। वहीं, दिव्यांगजन भी अपनी ट्राईसाइकल के सहारे पानी लाने की रोज की जद्दोजहद में जुटे नजर आते हैं।

कागजों पर सिमटी जल जीवन मिशन और नल-जल योजना

केंद्र और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी जल जीवन मिशन योजना छतरपुर के ग्रामीण अंचलों में धरातल पर पूरी तरह नाकाम साबित हो रही है। ठेकेदारों की लापरवाही और अधिकारियों की अनदेखी के कारण गांवों में पाइपलाइन तो बिछाई गई और घरों के बाहर नल के कनेक्शन भी लगा दिए गए, लेकिन आज तक उन नलों से पानी की एक बूंद भी नहीं टपकी। कई स्थानों पर पानी की टंकियों का निर्माण 20 प्रतिशत काम होने के बाद महीनों से बंद पड़ा है। ठेकेदारों ने पाइपलाइन डालने के नाम पर ग्रामीण सडक़ें तो खोद दीं, लेकिन उन्हें दुरुस्त नहीं किया, जिससे अब धूल और गड्ढों के कारण ग्रामीणों की परेशानी दोगुनी हो गई है।

शहर और गांव के बीच बढ़ती सुविधाओं की खाई

एक ओर जहां ग्रामीण इलाकों में पानी के लिए त्राही-त्राही मची है, वहीं शहर की स्थिति इसके उलट है। शहर में पचेर घाट और बूढ़ा बांध के फिल्टर प्लांट से नियमित रूप से पानी की सप्लाई की जा रही है। पचेर घाट प्लांट से रोजाना करीब 1.20 लाख लीटर पानी 20 वार्डों के 24 हजार परिवारों तक पहुंच रहा है। बूढ़ा बांध में आधुनिक लैब के जरिए पानी की गुणवत्ता सुधारी गई है, जिससे टीडीएस 500 से घटकर 100 के करीब आ गया है। नगर पालिका अमृत योजना के तहत शहर में 14 टंकियों के माध्यम से रोजाना लगभग एक करोड़ लीटर पानी बांट रही है। लेकिन प्रशासन ग्रामीण क्षेत्रों की इस विकराल समस्या पर मौन साधे हुए है। ग्रामीणों की उम्मीदें अब केन-बेतवा लिंक परियोजना पर टिकी हैं, लेकिन तत्काल राहत के कोई ठोस इंतजाम नजर नहीं आ रहे। यदि प्रशासन ने जल्द ही टैंकरों से सप्लाई और खराब हैंडपंपों की मरम्मत नहीं कराई, तो स्थिति और भी विकट और दुखद हो सकती है।

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