छतरपुर

किस्मत ने छीना था साथ पर उम्मीद ने फिर मिलाया: साढ़े तीन साल तक जिसे मरा समझकर रोते रहे अपने, आज उसी बेटी को सीने से लगाकर निहाल हुई मां

डिप्रेशन की गहरी धुंध में खो चुकी एक बेटी जब अपनी वृद्ध मां के सामने आई, तो मानों वक्त ठहर गया और साढ़े तीन साल का इंतज़ार आंसुओं के सैलाब में बह गया।

3 min read
Apr 11, 2026
मां बेटी का मिलन

दुनिया में मां-बेटी के रिश्ते से अनमोल कुछ भी नहीं है, और जब यह रिश्ता साढ़े तीन साल के लंबे और दर्दनाक बिछोह के बाद दोबारा जुड़ता है, तो पत्थर दिल भी पसीज जाते हैं। छतरपुर में शुक्रवार को एक ऐसा ही भावुक मंजर देखने को मिला, जिसने साबित कर दिया कि अगर सेवा और उम्मीद का साथ हो, तो किस्मत के लिखे को भी बदला जा सकता है। डिप्रेशन की गहरी धुंध में खो चुकी एक बेटी जब अपनी वृद्ध मां के सामने आई, तो मानों वक्त ठहर गया और साढ़े तीन साल का इंतज़ार आंसुओं के सैलाब में बह गया।

घर से निकली थी यादें खोकर, किस्मत ले आई अनजानी राहों पर

यह कहानी बिहार के सीतामढ़ी की रहने वाली सविता सिन्हा की है। करीब साढ़े तीन साल पहले सविता गंभीर मानसिक अवसाद (डिप्रेशन) का शिकार हो गई थीं। इस बीमारी ने उनसे उनके अपनों की पहचान और घर का रास्ता तक छीन लिया। इसी बदहवासी में वह एक दिन चुपचाप घर से निकल गईं। भटकते-भटकते वह ट्रेन के जरिए मध्य प्रदेश के दमोह रेलवे स्टेशन पहुंच गईं। दमोह पुलिस ने जब उन्हें लावारिस और मानसिक रूप से विक्षिप्त अवस्था में पाया, तो उन्हें रेस्क्यू किया। चूंकि उनकी हालत स्थिर नहीं थी, इसलिए उन्हें छतरपुर स्थित निर्वाना फाउंडेशन में देखभाल और इलाज के लिए भेज दिया गया।


तीन साल का मौन और सेवा का चमत्कार


संस्थान के संचालक संजय सिंह ने बताया कि जब सविता यहां आईं, तो उनकी स्थिति अत्यंत चिंताजनक थी। वह न तो अपना नाम बता पा रही थीं और न ही अपने घर का पता। शुरुआती एक साल तो उन्होंने संस्थान के कर्मचारियों के लिए काफी चुनौतीपूर्ण बना दिया था, क्योंकि वे किसी पर भरोसा नहीं कर पा रही थीं। लेकिन निरंतर उचित इलाज, स्नेहपूर्ण देखभाल और पारिवारिक माहौल ने धीरे-धीरे असर दिखाना शुरू किया। साढ़े तीन साल के लंबे संघर्ष के बाद आखिरकार सविता की याददाश्त की परतें खुलने लगीं और उन्होंने अपने परिवार के बारे में जानकारी देना शुरू किया।

मां का मोबाइल नंबर बना मिलन का सेतु

हाल ही में जब सविता पूरी तरह स्वस्थ हुईं, तो उन्होंने अपनी मां का मोबाइल नंबर साझा किया। संस्थान ने जब उस नंबर पर कॉल किया, तो दूसरी तरफ दिल्ली में रह रहे उनके भाई संतोष कुमार से बात हुई। भाई के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था, क्योंकि परिवार लंबे समय से सविता को ढूंढकर थक चुका था और एक समय ऐसा भी आया था जब उन्होंने अपनी लाड़ली के जीवित होने की आस लगभग छोड़ दी थी।


जब फफक-फफक कर रो पड़ी बूढ़ी मां


शुक्रवार को छतरपुर में जब सविता का भाई संतोष और मां निर्मला देवी पहुंचे, तो वहां का माहौल पूरी तरह बदल गया। साढ़े तीन साल की जुदाई के बाद जैसे ही सविता ने अपनी मां को देखा, वह दौड़कर उनके गले लग गई। मां ने भी अपनी बेटी को सीने से लगा लिया और काफी देर तक दोनों एक-दूसरे को पकड़कर रोते रहे। मां निर्मला देवी के चेहरे पर वह सुकून था, जो केवल अपनी खोई हुई संतान को वापस पाकर ही मिल सकता है। उन्होंने भारी गले से कहा मैंने तो उम्मीद ही छोड़ दी थी कि मेरी बेटी कभी मिलेगी, लेकिन भगवान ने मेरी पुकार सुन ली। आज मुझे मेरा खोया हुआ संसार वापस मिल गया है।

आभार और विदाई

सविता के भाई संतोष कुमार ने संस्थान के सदस्यों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यहां के लोगों ने उनकी बहन की सेवा एक परिवार के सदस्य की तरह की है। उन्होंने कहा कि आज वे अपनी बहन को लेकर बहुत खुश हैं और उसे वापस अपने घर बिहार ले जा रहे हैं। सभी कानूनी पचारिकताओं को पूरा करने के बाद सविता को उनके परिवार को सौंप दिया गया।

Published on:
11 Apr 2026 12:09 pm
Also Read
View All
अमृत 2.0 योजना से सुधरेगी छतरपुर की पेयजल व्यवस्था, अनगढ़ टौरिया और फिरंगी पछाड़ में 1 करोड़ की लागत से बनेंगी दो नई पानी टंकियां

Big News: MP में यहां पुलिस कस्टडी में युवक ने खाया जहर, मौत से मचा हड़कंप, TI निलंबित

मासूमों के साथ चिता पर लेटीं महिलाएं, एमपी में केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट का खौफनाक विरोध

खौफनाक साजिश: बड़ामलहरा में पत्नी ने ही रची थी पति की हत्या की पटकथा, केबल से गला घोंटकर शव को फंदे पर लटकाया; चार आरोपी गिरफ्तार

कहीं चूल्हा-चौका तो कहीं खेतों में मजदूरी, बुंदेलखंड के ग्रामीण अंचलों में 10 साल की उम्र के बाद पढ़ाई छोड़ रही हैं बेटियां, बेटों पर कम उम्र में कमाने की जिम्मेदारी