लेकिन अब घर में अनाज रखने की जगह नहीं है और ऊपर से बैंक का कर्ज व खाद-बीज की उधारी चुकानी है, इसलिए मजबूरी में कम दाम पर फसल बेचनी पड़ रही है।
जिले की सबसे बड़ी मंडियों में शुमार हरपालपुर कृषि उपज मंडी में इन दिनों बुंदेलखंड के किसानों की गाड़ी कमाई कौडिय़ों के दाम बिकती नजर आ रही है। रबी सीजन की मुख्य फसल गेहूं की आवक बढ़ते ही बाजार में दाम गिर गए। हालात यह हैं कि नया गेहूं न्यूनतम समर्थन मूल्य 2625 रुपए से काफी नीचे लुढक़कर 2100 से 2200 रुपए प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है। सरकारी खरीदी 15 अप्रेल से शुरू होनी है, लेकिन आर्थिक तंगी और भंडारण के अभाव में किसान अभी से औने-पौने दाम पर उपज बेचने को मजबूर हैं।
गेहूं की कटाई तेज होते ही मंडी में सुबह से ही ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की लंबी कतारें लग रही हैं। इमलिया के किसान दीपचंद्र राजपूत ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि एक महीने पहले तक यही गेहूं 2700 से 2800 रुपए में बिक रहा था, जिससे अच्छी उम्मीद थी। लेकिन अब घर में अनाज रखने की जगह नहीं है और ऊपर से बैंक का कर्ज व खाद-बीज की उधारी चुकानी है, इसलिए मजबूरी में कम दाम पर फसल बेचनी पड़ रही है। सरसेड़ के किसान उदयभान भदौरिया का भी यही कहना है कि पैसे की तत्काल जरूरत के कारण वे सरकारी खरीदी शुरू होने का इंतजार नहीं कर सकते।
मंडी के व्यापारियों का कहना है कि इस गिरावट के पीछे वैश्विक और स्थानीय कारण जिम्मेदार हैं। व्यापारी संजय गुप्ता ने बताया कि हरपालपुर से गेहूं मुख्य रूप से उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, दिल्ली और तेलंगाना की फ्लोर मिलों में जाता है, जहंा वर्तमान में मांग काफी कम है। साथ ही, अमेरिका-ईरान के बीच चल रहे तनाव और युद्ध की स्थिति के कारण आटा-मैदा का एक्सपोर्ट ठप पड़ा है। विदेशों में माल न जा पाने के कारण स्टॉक बढ़ गया है और नए गेहूं को स्टोर करना जोखिम भरा साबित हो रहा है।
मंडी इंस्पेक्टर अंकित अनुरागी के अनुसार इस बार मार्च के अंतिम सप्ताह में ही गेहूं की आवक उम्मीद से ज्यादा बढ़ गई है। रोजाना 2000 से 2500 क्विंटल गेहूं मंडी पहुंच रहा है। बार-बार बदलते मौसम और बारिश की आशंका के कारण किसान हार्वेस्टर से कटाई कराकर सीधे मंडी पहुंच रहे हैं ताकि फसल खराब न हो। अधिकारियों का मानना है कि 7 अप्रेल से सरकारी केंद्रों पर समर्थन मूल्य पर खरीदी शुरू होने के बाद मंडी में आवक कम होगी और भावों में कुछ स्थिरता आ सकती है। तब तक किसानों को अपनी लागत निकालना भी भारी पड़ रहा है।