कोयंबटूर

प्रभु के नाम स्मरण से शिथिल होते हैं कर्म बंधन

जैन आचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि जिस प्रकार चंदन के पेड़ पर लिपटा सर्प क्षण में ही पलायन कर जाता है उसी प्रकार प्रभु के नाम स्मरण के जरिए मंदिर में प्रवेश करते ही आत्मा केकर्मबंधन शिथिल हो जाते हैं।

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Sep 12, 2019
प्रभु के नाम स्मरण से शिथिल होते हैं कर्म बंधन
प्रभु के नाम स्मरण से शिथिल होते हैं कर्म बंधन

कोयम्बत्तूर.जैन आचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि जिस प्रकार चंदन के पेड़ पर लिपटा सर्प क्षण में ही पलायन कर जाता है उसी प्रकार प्रभु के नाम स्मरण के जरिए मंदिर में प्रवेश करते ही आत्मा केकर्मबंधन शिथिल हो जाते हैं। प्रभु की भक्ति व पूजा के स्थान पर मात्र नाम स्मरण भी आत्मा को भव के बंधन से मुक्त कर देता है।
उन्होंने बुधवार को Coimbatore बहुफणा पाश्र्वनाथ जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में चातुर्मास कार्यक्रम के तहत आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि लोगस्स सूत्र के बाद २४ जिनेश्वर परमात्मा का नाम स्मरण करने से उनको वंदन करते हैं। आराधना अनुष्ठान में जो कायोत्सर्ग करते हैं, उसमें लोगस्स सूत्र का स्मरण होता है। प्रतिदिन प्रतिक्रमण में भी अनेक बाद लोगस्स सूत्र का कायोत्सर्ग किया जाता है। अनेक बार उसका वाणी से स्पष्ट उच्चारण किया जाता है। उन्होंने कहा कि घाति कर्मों के क्षय के बाद तीर्थंकर के नाम कर्म उदय में आता है, उस कर्म के उदय से जन्म से चार, कर्मक्षय से ग्यारह, देवकृत १९ अतिशय, वचनातिशय,पूजातिशय, आपायापगमातिशय तथा अशोक वृक्ष आदि तीर्थंकरों समान होते हैं। उन्होंने कहा कि तीर्थंकरों के प्रमुख बारह गुणों, चार अतिशय -ज्ञानातिशय, वचना, पूजा अतिशय आदि आठ प्रतिहार्या सभी तीर्थंकरों के एक समान होते हंै। सभी तीर्थंकरों के च्यवन आदि पांच कल्याणक होते हैं। उन्होंने कहा कि सभी तीर्थंकरों के च्यवन समय माता को १४ स्वप्न दर्शन,जन्म के समय इंद्रों की ओर से मेरु पर्वत पर जन्माभिषेक,दीक्षा के समय इंद्र का आगमन, दीक्षा के बाद बाएं स्कंध पर देवदूष्य रखना, केवल ज्ञान बाद समवसरण आदि की रचना करना व निर्माण के समय इंद्रों का आगमन आदि सभी तीर्थंकरों का समान होता है।
उन्होंने कहा कि अरिंहत परमात्मा की आत्मा जब अव्यवहार राशि की निगोद से बाहर आती है तो पृथ्वीकाय के रूप में चिंतामणी रत्न, पदम राग रत्न आदि के रूप में पैदा होती है। अपकाय के रूप में तीर्योदक के जल के रूप में, वायुकालय में मलयाचल पर्वत के शीतल व सुगंधित पवन के रूप में, वनस्पति में चंदन, कल्पवृक्ष,बेइंद्रीय में शंख तथा अन्य उत्तम इंदिं्रयों के रूप में उत्पन्न होती हैं।

Published on:
12 Sept 2019 12:02 pm