Clampdown On Private Schools : नए शिक्षा सत्र में निजी स्कूलों की मनमानी पर नकेल कसने की तैयारी विभाग ने शुरू कर दी है। मनमाने ढंग से फीस बढ़ाने या चहेते बुक सेलर्स से किताबें खरीदवाने वाले स्कूलों को चिह्नित किया जाने लगा है। सीईओ ने सभी खंड शिक्षा अधिकारियों को क्षेत्र भ्रमण कर रिपोर्ट सौंपने के निर्देश जारी कर दिए हैं।
Clampdown On Private Schools : निजी स्कूलों की मनमानी पर शिक्षा विभाग अंकुश लगाने की तैयारी में है। उत्तराखंड में फीस बढ़ोतरी और कॉपी-किताबों की खरीद-फरोख्त में मनमानी करने वाले निजी स्कूलों पर शिक्षा विभाग शिकंजा कसेगा। सीईओ ने सभी खंड शिक्षा अधिकारियों को इस पर नजर रखने और फील्ड विजिट कर विस्तृत रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए हैं। कई जिलों में निजी स्कूलों ने छोटी कक्षाओं का परीक्षा परिणाम जारी करना शुरू कर दिया है। इसी के साथ ही नए सत्र में एडमिशन प्रक्रिया की की तैयारियां भी जोर शोर से शुरू कर दी गई हैं । देहरादून जिले की बात करें तो यहां एक हजार के आसपास निजी स्कूल हैं। इनमें से बीते साल सौ से ज्यादा के खिलाफ लिखित रूप से विभाग को स्कूल फीस बढ़ाने में मनमानी, चयनित पुस्तक विक्रेताओं से कापी-किताबें खरीदवाने आदि को लेकर शिकायतें प्राप्त हुई थीं। बताया जा रहा है कि इस साल भी कुछ स्कूल फीस बढ़ाने की तैयारी कर रहे हैं। दून के सीईओ विनोद कुमार ढौंडियाल ने खंड शिक्षा अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं कि खासतौर पर ऐसे स्कूलों पर नजर रखें जिनके खिलाफ पिछले साल शिकायतें प्राप्त हुई थीं। बता दें कि पिछले साल जिलाधिकारी सविन बंसल ने देहरादून शहर में चार नामी बुक सेलर्स के खिलाफ सख्त कार्रवाई की थी। उस कार्रवाई से हड़कंप मच गया था। इस बार शिकायत मिलने पर उससे भी सख्त कार्रवाई की संभावना है।
नए शिक्षा सत्र में अभिभावकों की जेब पर भारी असर पड़ता है। कई निजी स्कूल संचालक एनसीईआरटी के इतर अन्य प्रकाशकों की महंगी पुस्तकें भी खरीदने का दबाव अभिभावकों पर डालते हैं। जबकि सभी स्कूलों में केवल एनसीईआरटी की पुस्तकों से पढ़ाई का प्रावधान है। बताया जाता है कि अन्य प्रकाशकों की महंगी पुस्तकों को बिक्री करवाने पर निजी स्कूल संचालकों को कमिशन मिलता है। उसी कमीशन के लालच में निजी स्कूल संचालक अपने चहेते बुक सेलर्स पर मेहरबानी दिखाते आए हैं। इसका विरोध करने वाले अभिभावकों के बच्चों को स्कूल से निकलवाने की धमकी भी दी जाती है। इसी के चलते अभिभावक खामोशी से जुर्म सहन करते रहते हैं। इसके अलावा अभिभावकों पर हर साल महंगी ड्रेस खरीदवाने का दबाव भी निजी स्कूल प्रबंधन डालते आए हैं।