-फूल, अमरूद के बीच की जगह में प्याज-लहसुन की भी हो रही खेती, अंतरवर्ती खेती से तीन गुना तक मुनाफा कमा रहे मुकुंदगढ़ के उन्नत किसान
सत्येंद्रसिंह राठौर. देवास
करीब 7 साल पहले तक पारंपरिक खेती करने वाले मुकुंदगढ गांव के उन्नत किसान अभय शर्मा अब अंतरवर्ती खेती से तीन गुना तक मुनाफा कमा रहे हैं। मात्र दो क्यारी से प्रायोगिक रूप से शुरू की गई रजनीगंधा फूलों की खेती एक हेक्टेयर तक पहुंच गई है। इसी के बीच-बीच अमरूद के लगाए गए पौधे अतिरिक्त आय दे रहे हैं। वहीं फूलों व अमरूद के पौधों के बीच की खाली जगह का भी उपयोग हो रहा है, इस जगह पर प्याज व लहसुन की फसल लगाई जा रही है।
जिले के भमोरी क्षेत्र के गांव मुकुंदगढ़ के किसान अभय शर्मा के पास करीब 35 बीघा खेती है। खेतीबाड़ी का विशेष शौक रखने वाले शर्मा की पारंपरिक खेती से अलग कुछ करने की चाह ने 2017 में नया प्रयोग किया और रजनीगंधा के फूलों की खेती वरिष्ठ उद्यान विकास अधिकारी राकेश सोलंकी व उन्नत किसान आशीष शर्मा की सलाह पर शुरू की। दो क्यारियों से फूलों की खेती शुरू की गई, धीरे-धीरे खेती का दायरा व आय बढ़ती गई। वर्तमान में एक हेक्टेयर में खेती की जा रही है। शर्मा ने बताया रजनीगंधा की खेती में आलू की तरह एक गठान से कई तैयार होती हैं, बाद में इनसे डंडियां निकलती हैं जिनमें फूल लगते हैं। डंडी सहित काटकर इनको फूल मंडी इंदौर पहुंचाया जाता है।
अधिकतम 8 रुपए प्रति डंडी तक भाव
किसान शर्मा ने बताया मांग के अनुसार फूलोंं के दाम मिलते हैं। इतने सालों में वो कम से कम एक रुपए प्रति डंडी से लेकर 8 रुपए अधिकतम में बेच चुके हैं। शादी-ब्याह के सीजन में भाव अच्छे मिलते हैं।
आंध प्रदेश से मंगवाए अमरूद के पिंक ताइवान वैरायटी के 1400 पौधे
कोरोना काल में किसान शर्मा ने रजनीगंधा के फूलों वाली खेती के बीच अमरूद का बगीचा तैयार किया। इसके लिए 1400 पौधे आंधप्रदेश से मंगवाए थे, इनमें से लगभग शत-प्रतिशत तैयार हो गए हैं। साल में दो बार फल लगते हैं, सालाना करीब डेढ़ लाख की आय अमरूद से हो जाती है।
एक बार लगाने पर तीन-चार साल तक रजनीगंधा की फसल
रजनीगंधा की फसल एक बार लगाने पर तीन से चार साल तक चल जाती है। फूलों के अलावा गठान की बिक्री करने से भी आय होती है। फूलों, गठान से करीब दो लाख रुपए की वार्षिक आय होती है। किसान शर्मा ने बताया पारंपरिक खेती में कई बार प्राकृतिक प्रकोप के कारण लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता था, उसकी तुलना में रजनीगंधा, अमरूद की खेती से करीब तीन गुना अधिक आय हो रही है।
जिरेनियम की खेती भी की, प्रोसेसिंग प्लांट नहीं होने से बंद किया
किसान शर्मा ने पारंपरिक खेती से हटकर सबसे पहले जिरेनियम की खेती 2015 में शुरू की थी। इसकी पत्तियों को बायलर में डालकर वाष्पीकरण प्रक्रिया से सेंट तैयार होता है। कुछ पौधों से उन्होंने शुरुआत की और बेहतर वातावरण से पौधों की संख्या 200 से अधिक हो गई, हालांकि इसके प्रोसेसिंग प्लांट क्षेत्र में नहीं होने से पौधों को नष्ट करना पड़ा।