Bhojshala: धार की भोजशाला को हाईकोर्ट ने मंदिर मानते हुए हिंदुओं को पूजा का अधिकार दिया, मुस्लिमों को मिला नमाज का अधिकार निरस्त।
Bhojshala: मध्यप्रदेश के धार की भोजशाला को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने बड़ा फैसला सुनाते हुए भोजशाला को वाग्देवी का मंदिर माना है। 6 अप्रैल से लगातार हाईकोर्ट में भोजशाला मामले को लेकर सुनवाई हो रही थी और शुक्रवार को कोर्ट ने बड़ा फैसला लेते हुए भोजशाला को मंदिर माना। हाईकोर्ट ने अपन फैसले में कहा कि ऐतिहासिक साक्ष्यों को ध्यान में रखा गया है, भोजशाला संस्कृत शिक्षा का केन्द्र था। इतना ही नहीं कोर्ट ने भोजशाला में हिन्दुओं को पूजा का अधिकार भी दिया है। कोर्ट के फैसले के बाद हिंदू संगठनों में जश्न का माहौल है और वो खुशियां मना रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की बात कही है।
इससे पहले भोजशाला मंदिर है या फिर मस्जिद इसे लेकर हुई सुनवाई में हिंदू, मुस्लिम और जैन समाज की ओर से अपने-अपने तर्क दिए, जानिए किस पक्ष ने क्या तर्क दिए।
मुस्लिम पक्ष- मुस्लिम पक्ष की ओर से कोर्ट में कहा गया कि भोजशाला मंदिर है, मस्जिद है या जैनशाला, ये अभी स्पष्ट नहीं है। मुस्लिम पक्ष की ओर से ये भी कहा गया कि पविवादित स्थल का धार्मिक स्वरूप तय करने का अधिकार सिविल कोर्ट को है। हाई कोर्ट अनुच्छेद 226 के तहत रिट अधिकार क्षेत्र में सुनवाई कर रहा है। मुस्लिम पक्ष की ओर से ASI सर्वे पर भी सवाल उठाए गए और कहा गया कि ASI ने जो वीडियोग्राफी प्रस्तुत की है वो स्पष्ट नहीं है। अयोध्या फैसले का उल्लेख करते हुए ये भी तर्क दिया गया कि अयोध्या में रामलला की मूर्ति विराजमान थी, लेकिन भोजशाला में कोई स्थापित मूर्ति नहीं है।
हिंदू पक्ष- हिंदू पक्ष की ओर से कोर्ट में कहा गया कि भोजशाला एएसआई द्वारा संरक्षित स्मारक है। प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम 1951 की सूची में भोजशाला का नाम दर्ज है। साल 2024 में अश्विनी उपाध्याय केस में दिए तर्क को भोजशाला मामले में लागू नहीं किया जा सकता। 7 अप्रैल 2003 को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा जारी आदेश को निरस्त करने की मांग हिंदू पक्ष की ओर से की गई। हिंदू पक्ष की ओर से कोर्ट से आग्रह किया गया कि भोजशाला का धार्मिक स्वरूप तय कर इसे पूर्ण रूप से हिंदू समाज को सौंपा जाए, जिससे मां सरस्वती की पूजा और हवन वर्षभर निर्बाध रूप से किया जा सके।
जैन समाज- कोर्ट में जैन समाज की ओर से भी तर्क दिए गए। जैन समाज की ओर से कहा गया कि जो प्रतिमा मां वाग्देवी की बताई जा रही है, वह जैन समुदाय की आराध्य मां अंबिका की है। सीहोर में मां अंबिका के मंदिर में ठीक वैसी ही प्रतिमा है, जो भोजशाला में मिली थी। इसे जैन तीर्थ घोषित किया जाना चाहिए।