लखनऊ

बता ऐ मेरे हिन्दुस्तान, उन्हें हम क्या दे पाए… नदी के बीच से जाना पड़ता है स्वतंत्रता सेनानी जीवाभाई के घर

गणतंत्र व स्वतंत्रता दिवस समारोह में आने के लिए नहीं मिलती सुविधा
3 min read
Jan 31, 2017
Jivabhai freedom fighter has to go to the middle o
Jivabhai freedom fighter has to go to the middle of the river to the house

जिन्होंने हंस कर दे दी जान, बढ़ाया भारत मां का मान.. बता ऐ मेरे हिन्दुस्तान ...उन्हें हम क्या दे पाए...। किसी कवि की इन पंक्तियों में उठता सवाल जंग-ए-आजादी की लड़ाई लडऩे वालों पर आज भी सटीक बैठता हैं। ब्रिटिश हुकूमत से आजादी के लिए राजस्थान का दक्षिण अंचल वागड़ भी कभी पीछे नहीं रहा, लेकिन आजादी के 70 साल बाद भी देश के लिए जेल की यातनाएं सहने वालों को एक पक्की सड़क तक नहीं दे पाए। डूंगरपुर में आखिरी जीवित स्वतंत्रता सैनानी जीवाभाई भगोरा के घर पहुंचने के दुर्गम रास्ते को देखकर यही लगता है। गुजरात से सटी वीरपुर ग्राम पंचायत के निचला झापा गांव से विनय सोमपुरा और फोटो जर्नलिस्ट हरमेश टेलर की लाइव रिपोर्ट...।

गणतंत्र व स्वतंत्रता दिवस समारोह में आने के लिए नहीं मिलती सुविधा

स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गांधी के देशव्यापी आंदोलनों से वागड़ भी प्रभावित रहा। भोगीलाल पण्ड्या, गोविन्द गुरु, नानाभाई खांट, किशनलाल गर्ग, गौरीशंकर उपाध्याय, हरिदेव जोशी जैसे कई स्वतंत्रता सेनानियों की अगुवाई में प्रजामंडल और राजस्थान सेवा संघ के माध्यम से आदिवासियों ने भी इस लड़ाई में अपनी महती भूमिका निभाई। उन्हीं में से एक जीवाभाई भगोरा हैं। वे वर्तमान में जिले के एकमात्र जीवित स्वतंत्रता सेनानी हैं।

सड़क तक नसीब नहीं


थाणा-मेवाड़ा मार्ग पर जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर निचला झापा गांव गुजरात से सटा है। पहले पत्रिका टीम वीरपुर गांव के बस स्टैंड पहुंची। वहां से एक खुर्दबुर्द सड़क पर आगे बढ़े। यहां से गुजरते मोटर साइकिल सवार दो लोगों से जीवा भाई का पता पूछा तो कहा कि पीछे चले आओ। कुछ दूर सड़क छोड़ पगडंडीनुमा कच्ची सड़क पर उतरे। थोड़ा आगे जाते ही नदी सामने आ गई तो दोनों बोले- 'जीवा भाई के घर जाने का यही रास्ता है। नदी पार कर जाना होगा।' यह देखकर लगा कि भले ही बड़ी-बड़ी नदियों पर करोड़ों के पुल बनें, लेकिन जिन्होंने आजादी दिलाने में योगदान दिया, वे भी मुख्य धारा से जुडऩे चाहिए थे।

धुंधलाई आंखों में आई चमक


नदी पार कर दोबारा कच्ची सड़क से पत्रिका टीम जीवाभाई के घर तक पहुंची। आंगन के एक छोर पर महिला चूल्हे पर रोटी बनाती मिली। दूसरी ओर कुर्सी लगाए एक बुजुर्ग बैठे धूप सेंक रहे थे। बदन पर धोती और कंधों पर शॉल डाले, गांधी चश्मे लगाए बुजुर्ग को देखकर समझने में तनिक देर नहीं लगी कि यही जिले में जंग-ए-आजादी का अंतिम जीवित सिपाही और साक्षी है। पास में जाकर प्रणाम करने पर उनकी धुंधलाई आंखों में चमक और होंठों पर मुस्कान बिखर गई।

परिवार के लोग कौतुहलवश एकत्र हो गए। आपसी परिचय में पता चला कि जीवाभाई के तीन पुत्र थे। बड़े पुत्र नरसिंग का 10 साल पहले निधन हो गया। मंझला बेटा कमलाशंकर अहमदाबाद में रहता है। छोटा पुत्र कांतिलाल और उनका परिवार पिता जीवाभाई और मां राजू बा के साथ हैं। शतायु होने जा रहे जीवाभाई ठीक से बोल नहीं पाते। सुनाई भी कम देता है।

फरियाद की, अफसर आए, हुआ कुछ नहीं


कांतिलाल ने बताया कि सरकार की ओर से पेंशन के अलावा कोई विशेष लाभ नहीं मिला। मकान कवेलूपोश ही था। हाल ही पास में पक्का मकान बनाया है। पुरखों की जमीन पर खेती से आजीविका चल रही है। माजम नदी पर रपट और सड़क के लिए पंचायत से लेकर कलक्ट्रेट तक फरियाद की। कुछ अफसर देख भी गए, लेकिन कुछ नहीं हुआ।

बुलावा भेज कर्तव्य पूरा


हर साल 15 अगस्त व 26 जनवरी को प्रशासनिक परंपरा के चलते जीवाभाई को जिला स्तरीय समारोह का न्योता मिलता है, लेकिन आने-जाने की कोई व्यवस्था नहीं होती है। कांतिलाल 1500 से 2000 रुपए में वाहन किराए कर उन्हें ले जाता है। भले ही मंत्रियों और अफसरों के काफिलों में सरकारी गाडिय़ां ईंधन का धुआं उड़ाती रहें, लेकिन स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मान के लिए भी ससम्मान लाने की पहल नहीं होती।

Published on:
31 Jan 2017 02:10 pm
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