
नई दिल्ली। नवरात्र के अंतिम दिन कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है। व्रत रखने वाले भक्त कन्याओं को भोजन कराने के बाद ही अपना व्रत खोलते हैं। कन्याओं को देवी मां का स्वरूप माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन कन्याओं को भोजन कराने से घर में सुख, शांति एवं सम्पन्नता आती है। कन्या भोज के दौरान नौ कन्याओं का होना आवश्यक होता है। इस बीच यदि कन्याएं 10 वर्ष से कम आयु की हो तो जातक को कभी धन की कमी नही होती और उसका जीवन उन्नतशील रहता है।
1. नवरात्र पर कन्या पूजन के लिए कम से कम दो वर्ष की कन्या हो तो अच्छा रहता है। क्योंकि इससे छोटी कन्या भोजन ग्रहण नही कर सकती। नवमी वाले दिन कन्या पूजन करना चाहिए। इस दिन दो वर्ष की कन्या को भोजन कराने से घर से दुख और दरिद्रता दूर हो जाती है।
2. इसी तरह तीन वर्ष की कन्या का पूजन करने से घर में धन-सम्पत्ति में वृद्धि होती है। साथ ही परिवार का महौल खुशनुमा रहता है। तीन वर्ष की कन्या को त्रिमूर्ति का स्वरूप भी माना जाता है।
3. नवमी वाले दिन चार साल की कन्या को पूजने से परिवार में कभी अशांति नहीं होती। सदैव कल्याण होता है। इसलिए इस उम्र की कन्याओं को कल्याणी भी कहा जाता है।
4. नवरात्र पर पांच वर्ष की कन्या का पूजन करने से व्यक्ति रोगमुक्त रहता है। इस आयु की कन्या को रोहिणी का स्वपरूप माना जाता है।
5. इस दिन छह साल की कन्या पूजन करने से व्यक्ति को हर कार्य में विजय प्राप्त होती है। इसके अलावा उसे राजयोग की भी प्राप्ति होती है। छह साल की कन्या को देवी कालिका का रूप माना जाता है।
6. वहीं 7 साल की कन्या मां चंडिका का स्वरूप माना जाता है। नवरात्र पर कन्या के इस रूप में मां की आराधना करने से घर में ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
7. नवरात्र पर 8 वर्ष की कन्या को भोजन कराने से घर-परिवार में चल रहे सारे विवाद से मुक्ति मिल जाती है। यदि कोई जमीन-जायदाद का केस चल रहा होता है तो उसमें भी जातक को विजय मिलती है। इस आयु की कन्याएं शाम्भवी कहलाती हैं।
8. नवमी वालें दिन 9 साल की कन्या का पूजन बहुत शुभ माना जाता है। क्योंकि इस उम्र की कन्या साक्षात मां दुर्गा का स्वरूप होती हैं। इनका पूजन करने से आपका बुरा सोचने वालों को सबक मिलता है और सारे शत्रुओं का नाश हो जाता है। इसके अलावा कन्या पूजन से जातक के असाधारण कार्य भी पूरे हो जाते हैं।
9. नवरात्र में दस साल की कन्या का पूजन करने से व्यक्ति की सारी मनोकामनाएं पूरी होती है। इन्हें सुभद्रा का स्वरूप माना जाता है।
10.पौराणिक धर्म ग्रंथों एवं पुराणों के अनुसार नवरात्री के अंतिम दिन कौमारी पूजन के बिना भक्त के नवरात्र व्रत अधूरे माने जाते हैं। कन्या पूजन के लिए सप्तमी, अष्टमी और नवमी तिथि को उपयुक्त माना जाता है।