
डौंडीलोहारा ब्लॉक के किल्लेकोड़ा पंचायत के आश्रित ग्राम अगरियापारा में शिक्षा व्यवस्था की तस्वीर झकझोर देने वाली है। यहां मासूम बच्चे 47 साल पुराने जर्जर स्कूल भवन में बैठकर अपना भविष्य गढऩे को मजबूर हैं। 1978 में बना भवन कभी भी हादसे को न्योता दे सकता है। दीवारों में बड़ी-बड़ी दरारें हैं। बारिश में छत से पानी टपकता है। पहले यह भवन खपरैल का था। बारिश में बच्चों की परेशानी देख ग्रामीणों ने चंदा और जनपद सदस्य के सहयोग से सीमेंट की शीट डलवाई, लेकिन वह जुगाड़ भी जवाब दे चुका है। ग्रामीणों का कहना है कि अब पक्की छत वाला नया भवन बनना ही चाहिए।
ग्रामीण 10 से 15 साल से नए भवन के लिए दर-दर भटक रहे हैं। 40 से ज्यादा आवेदन दे चुके हैं। सुशासन तिहार में भी आवेदन दिया, सोमवार को जनदर्शन में कलेक्टर को ज्ञापन भी सौंपा, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला।
ग्राम विकास समिति के अध्यक्ष हेमलाल दामले ने कहा कि ऐसा लगता है सरकार ही नहीं चाहती कि बच्चों का स्कूल अच्छा बने। सरकारी कार्यक्रमों में लाखों रुपए बिना प्रस्ताव के खर्च हो जाते हैं, पर हमारे बच्चों के स्कूल के लिए स्वीकृति में सालों लग जाते हैं। शाला विकास समिति के सदस्य बिसौहा राम ने कहा कि इस बार भी नहीं सुनी गई तो आंदोलन और स्कूल में तालाबंदी करनी पड़ेगी।
स्कूल के साथ बने मध्याह्न भोजन के किचन शेड की हालत और भी दयनीय है। सात फीट ऊंची कच्ची दीवारों पर सीमेंट शीट रखी है, सामने दरवाजा तक नहीं है। तेज बारिश में रसोइया भोजन नहीं बना पाती और धुआं निकलने की जगह नहीं होने से आंखों में आंसू आ जाते हैं।
यह हाल सिर्फ अगरियापारा का नहीं है बल्कि जिले के 17 स्कूल आज भी भवन विहीन हैं, जहां बच्चे कला मंच और सामुदायिक भवनों में बैठकर पढ़ते हैं। 64 स्कूल जर्जर हैं और 18 स्कूल इतने ज्यादा जर्जर हैं कि उन्हें तोडऩा ही एकमात्र विकल्प है।
डीईओ दीपक दुबे ने कहा कि अगरियापारा के जर्जर स्कूल की जानकारी मिली है। जिले के सभी जर्जर स्कूलों की सूची शासन को भेज दी गई है, जिसमें इस स्कूल को भी शामिल किया गया है। शासन से स्वीकृति मिलते ही निर्माण कार्य शुरू कराया जाएगा। सभी स्कूलों को निर्देश दिए गए हैं कि जर्जर भवन में बच्चों को न बैठाएं।