
ग्वालियर. साइबर ठगों के बढ़ते हौसले और आम जनता की गाढ़ी कमाई लूटने के नए-नए तौर-तरीकों के बीच ग्वालियर पुलिस की कार्यप्रणाली कागजी दावों तक ही सिमट कर रह गई है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर 17 महीने पहले ई-जीरो एफआइआर की व्यवस्था लागू होने के बाद थानों में साइबर ठगी के मामले तो धड़ल्ले से दर्ज होने लगे हैं, लेकिन इन मामलों की तफ्तीश करने के लिए थानों में न तो कोई आधुनिक तकनीकी सेटअप है और न ही एक भी साइबर एक्सपर्ट। नतीजा यह है कि करोड़ों रुपये ठगे जाने के बावजूद दीवान और दरोगाओं के हवाले चल रही जांच फाइलों में ही दम तोड़ रही है।
थाने में कार्रवाई एफआइआर तक
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के निर्देशानुसार पहले 1 लाख रुपए तक की ऑनलाइन ठगी और अब इसकी सीमा घटाकर 25 हजार रुपए्र कर दी गई है। इसके चलते पहले जिन मामलों में पीड़ित थाने के चक्कर काटते-काटते थक जाता था, अब वे आसानी से दर्ज हो रहे हैं। ग्वालियर जिले में पिछले 17 महीनों के भीतर 775 से अधिक साइबर ठगी के मामले सामने आ चुके हैं। इनमें से कुछ बड़ी वारदातों की फाइलें तो क्राइम ब्रांच या साइबर सेल को सौंप दी गईं, लेकिन बाकी के सैकड़ों मामले संबंधित थानों के हवाले कर दिए गए। विडंबना यह है कि इन थानों में कार्रवाई केवल एफआइआर की कॉपी थमाने तक ही सीमित होकर रह गई है।
कानून कुछ कहता है, थाने के साहब कुछ और
-साइबर कानून के प्रावधानों के मुताबिक, आईटी एक्ट से जुड़े इन मामलों की विवेचना की मुख्य जिम्मेदारी थाना प्रभारी की होती है। लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है।
-दरोगा और दीवान के भरोसे जांच: थानों में तैनात स्टाफ तकनीकी रूप से अप्रशिक्षित है, फिर भी साइबर ठगी के मामलों की जांच हवलदारों और सब-इंस्पेक्टरों को थमा दी जाती है।
-थाना प्रभारियों का तर्क: जब इस बाबत थाना प्रभारियों से बात की जाती है, तो उनकी अपनी मजबूरियां होती हैं। उनका कहना है कि साइबर ठगों का नेटवर्क किसी एक जिले या राज्य तक सीमित नहीं होता। ठगी की रकम को देश के अलग-अलग राज्यों के म्यूल खातों में घुमाया जाता है। ऐसे में आरोपियों की तलाश में दूसरे राज्यों के चक्कर काटने और महीनों कैंप करने से थाने की रोजमर्रा की कानून-व्यवस्था और अन्य आपराधिक मामलों की जांच ठप हो जाती है।
एक्सपर्ट व्यू
अपराधियों से दो कदम आगे रहना होगा
अपराध के तरीकों में आमूल-चूल बदलाव आ चुका है। पारंपरिक अपराध जैसे हत्या, लूट और डकैती के मामलों में भले ही कमी आई हो, लेकिन डिजिटल और साइबर अपराध पुलिस के लिए बड़ा सिरदर्द बन चुके हैं। इस चुनौती से निपटना है, तो सरकार और पुलिस मुख्यालय को थाना स्तर पर विशेष साइबर सेल या प्रशिक्षित डेस्क बनानी होगी। जब तक हर थाने में पुलिसकर्मियों को डिजिटल इन्वेस्टिगेशन में पारंगत नहीं किया जाएगा, तब तक साइबर अपराधी कानून की पकड़ से बाहर ही घूमते रहेंगे और जनता लुटती रहेगी।
पी.के. सारस्वत, सेवानिवृत्त सीएसपी