शर्तों को हटाने के लिए दायर की थी याचिका
ग्वालियर. हाईकोर्ट की एकल पीठ ने वन्यजीव अभयारण्य घोषित क्षेत्र की जमीन से जुड़े एक मामले में स्पष्ट किया है कि वैधानिक रोक के रहते समझौता डिक्री का पंजीयन अनिवार्य शर्तों के बिना नहीं कराया जा सकता। न्यायमूर्ति अमित सेठ ने फैसला सुनाते हुए हरङ्क्षमदर ङ्क्षसह एवं अन्य की याचिका निरस्त कर दी।
मामला शिवपुरी जिले के ग्राम चिताहरी में स्थित भूमि का है, जो वर्ष 2000 में जारी अधिसूचना के तहत सोन चिरैया अभ्यारण्य के अधिसूचित क्षेत्र में आती है। इसको लेकर हरङ्क्षमदर ङ्क्षसह अन्य ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर 8 अगस्त 2017 को सिविल सूट में पारित समझौता डिक्री में लगी उस शर्त को हटाने की मांग की थी, जिसमें कहा गया था कि डिक्री पंजीयन के बाद ही प्रभावी होगी। उनका तर्क था कि पंजीयन अधिनियम, 1908 की धारा 17(2)( 1द्ब) के तहत ऐसी डिक्री का पंजीयन आवश्यक नहीं है और यह केवल पूर्व से विद्यमान अधिकारों की पुष्टि करती है। राज्य शासन की ओर से दलील दी गई कि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 20 के तहत अधिसूचना के बाद भूमि पर नए अधिकारों के सृजन पर रोक है, इसलिए समझौता डिक्री के आधार पर पंजीयन कराना संभव नहीं।
कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि समझौता डिक्री केवल पूर्ववर्ती अधिकारों की घोषणा करती है तो पंजीयन आवश्यक नहीं, लेकिन यदि उससे नए अधिकार उत्पन्न होते हैं तो पंजीयन अनिवार्य होगा। प्रस्तुत मामले में डिक्री का प्रभाव नए अधिकारों के सृजन जैसा प्रतीत होता है, इसलिए इसे पंजीयन से मुक्त नहीं माना जा सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि वैधानिक प्रतिबंधों को दरकिनार कर पंजीयन कराने के लिए रिट जारी नहीं की जा सकती।