एजेंसियों के नाम पर ठगी का खेल
ग्वालियर. डिजिटल ठग कानून का डर दिखाकर करोड़ों रुपए की ठगी कर रहे हैं। जिन एजेंसियों से लोगों को सुरक्षा और मदद की उम्मीद होती है, उन्हीं के नाम पर जालसाज ठगी का खेल चला रहे हैं। खास बात यह है कि इस धंधे के मास्टरमाइंड अब तक कानून की जद में नहीं आए हैं। हर वारदात के बाद ठगी के लिए बैंक खाते बेचने और उपलब्ध कराने वाले ही पकड़े गए हैं। पिछले करीब एक साल में साइबर ठगों ने ‘डिजिटल अरेस्ट’ का डर दिखाकर शहर से 6.91 करोड़ रुपए ऑनलाइन ठग लिए हैं। खास बात यह है कि हर वारदात में ठगी का तरीका और इस्तेमाल किया गया जुमला लगभग एक जैसा रहा है, और इनके शिकार ज्यादातर उम्रदराज लोग ही बने हैं।
हर वारदात में एक ही पैटर्न
पिछले एक साल में डिजिटल अरेस्ट की चार बड़ी वारदातें हुई हैं। हर मामले में साइबर ठगी का पैटर्न लगभग एक जैसा रहा है।
टारगेट: ठगों के निशाने पर उम्रदराज और अकेले रहने वाले लोग रहे हैं। जालसाज इन्हें लंबे समय तक डिजिटल अरेस्ट का डर दिखाकर धमकाते हैं और फिर रकम ठग लेते हैं।
इस तरह बचें ठगों के जाल से
कानून की किताब में ‘डिजिटल अरेस्ट’ नाम का कोई प्रावधान नहीं है। यह साइबर जालसाजों द्वारा गढ़ा गया भ्रामक शब्द है। ऐसे किसी कॉल पर बिल्कुल भरोसा न करें और तुरंत पुलिस को सूचना दें। सीबीआई, ईडी या पुलिस कभी वीडियो कॉल पर जांच नहीं करती और न ही डिजिटल तरीके से बैंक खाते या उनमें जमा रकम का ब्यौरा मांगती है।
वारदात का तरीका:
जालसाज खुद को सीबीआई, ईडी या पुलिस अधिकारी बताकर लोगों को वीडियो कॉल करते हैं। भरोसा दिलाने के लिए वे बैकग्राउंड में थाने, सीबीआई कार्यालय और कोर्टरूम जैसा ²श्य भी तैयार कर लेते हैं।
हर महीने ठगों की कमाई
साइबर ठगों ने केवल डिजिटल अरेस्ट के मामलों से पिछले करीब 13 महीनों में 6.91 करोड़ रुपए ठगे हैं। आंकड़ों के अनुसार, ठग हर महीने औसतन 53.15 लाख रुपए उड़ा रहे हैं।
ठगों पर कसावट : डिजिटल अरेस्ट की वारदातों में साइबर पुलिस ने म्यूल खाते बेचने वालों और ठगी की रकम हड़पने वालों पर तो शिकंजा कसा है, लेकिन असली मास्टरमाइंड हर बार पकड़ से बाहर रहे हैं।