
ग्वालियर. हिंदू विवाह महज एक अनुबंध नहीं, बल्कि एक पवित्र संस्कार है, जिसे नोटरी के समक्ष कागजों पर हस्ताक्षर कर समाप्त या स्थापित नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि जब तक सक्षम न्यायालय से तलाक की वैध डिक्री प्राप्त नहीं होती, तब तक पहली शादी कानूनी रूप से अस्तित्व में बनी रहती है। जस्टिस जीएस अहलूवालिया और अनुराधा शुक्ला की युगलपीठ ने राम कृपाल सिंह की रिट अपील खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने केवल विवाह अनुबंध पत्र के आधार पर खुद को मृत महिला कर्मचारी का पति बताने वाले व्यक्ति के दावे को अस्वीकार कर दिया। आदिवासी विकास विभाग में चौकीदार के पद पर कार्यरत सुमन देवी का अगस्त 2022 में सेवाकाल के दौरान निधन हो गया था। इसके बाद राम कृपाल सिंह ने स्वयं को उनका पति बताते हुए पेंशन, जीपीएफ और अन्य वित्तीय लाभों पर दावा किया। हालांकि, विभाग ने सर्विस बुक में दर्ज पहले पति कोक सिंह कुशवाह और उनके बच्चों को ही वैध उत्तराधिकारी माना।
सर्विस रिकॉर्ड ने खोली दावे की पोल
अदालत के समक्ष प्रस्तुत दस्तावेजों के अनुसार, वर्ष 2004 में विभाग ने सुमन देवी से स्पष्टीकरण मांगा था कि अवकाश आवेदन में पति का नाम राम कृपाल सिंह क्यों दर्ज है, जबकि सेवा पुस्तिका में कोक सिंह कुशवाह का नाम अंकित है। इस पर सुमन देवी ने लिखित रूप से स्पष्ट किया था कि कोक सिंह कुशवाह ही उनके वैध पति हैं और राम कृपाल सिंह से उनका कोई वैवाहिक या अन्य संबंध नहीं है।
नोटरी तलाक और विवाह अनुबंध को माना शून्य
राम कृपाल सिंह ने अदालत में तर्क दिया कि सुमन देवी का अपने पहले पति से वर्ष 1998 में नोटरी के माध्यम से तलाक हो चुका था और वर्ष 1999 में उन्होंने 'घरीचा' प्रथा के तहत विवाह अनुबंध पत्र के जरिए शादी की थी। अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत बिना न्यायालय की डिक्री के किया गया कोई भी तथाकथित तलाक कानूनी रूप से शून्य है। इसलिए सुमन देवी और कोक सिंह कुशवाह का वैवाहिक संबंध कभी समाप्त ही नहीं हुआ।
लिव-इन संबंध से नहीं मिलती वैधता
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि दोनों लंबे समय तक साथ रह रहे थे और उसे लिव-इन रिलेशनशिप माना भी जाए, तब भी पहली शादी के रहते हुए ऐसे संबंध को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती। अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5 और 11 के अनुसार पहली शादी के रहते दूसरी शादी पूरी तरह अवैध मानी जाएगी और उससे किसी प्रकार के वैधानिक अधिकार उत्पन्न नहीं होंगे।