ग्वालियर. कभी घर की चारदीवारी और बुजुर्गों की मध्यस्थता में सुलझ जाने वाले पति-पत्नी के छोटे-मोटे झगड़े अब तेजी से अदालत की चौखट तक पहुंच रहे हैं। आधुनिक जीवनशैली की भागदौड़ और बढ़ती महत्वाकांक्षाओं के बीच समय सबसे बड़ा विलेन बनकर उभरा है। ग्वालियर कुटुंब न्यायालय के ताजा आंकड़े इस बात की तस्दीक कर रहे […]
ग्वालियर. कभी घर की चारदीवारी और बुजुर्गों की मध्यस्थता में सुलझ जाने वाले पति-पत्नी के छोटे-मोटे झगड़े अब तेजी से अदालत की चौखट तक पहुंच रहे हैं। आधुनिक जीवनशैली की भागदौड़ और बढ़ती महत्वाकांक्षाओं के बीच समय सबसे बड़ा विलेन बनकर उभरा है। ग्वालियर कुटुंब न्यायालय के ताजा आंकड़े इस बात की तस्दीक कर रहे हैं कि रिश्तों की डोर अब पहले जैसी मजबूत नहीं रही। विशेषज्ञों के अनुसार, करीब 45 फीसदी वैवाहिक विवादों की असली जड़ टाइम क्राइसिस (समय की कमी) है। स्थिति यह है कि 2026 के शुरुआती तीन महीनों में ही 738 जोड़े अपने विवाद सुलझाने या अलग होने के लिए अदालत पहुंच चुके हैं। यदि अतीत के पन्नों को पलटें, तो रिश्तों में आए इस बिखराव की भयावहता साफ दिखती है। वर्ष 2014 तक कुटुंब न्यायालय में गिने-चुने मामले आते थे और एक ही जज उनकी सुनवाई करते थे। वर्ष 2016 में यह संख्या बढ़कर 45 तक पहुंची, लेकिन इसके बाद तो जैसे रिश्तों के टूटने की बाढ़ आ गई। 31 मार्च 2026 तक शहर के करीब 12 हजार वैवाहिक प्रकरण अदालत में लंबित हैं। पिछले कुछ वर्षों की वृद्धि दर चौंकाने वाली है। 2019 में जहां 595 मामले आए थे, वहीं 2025 तक यह आंकड़ा 2700 तक पहुंच गया। 2026 की रफ्तार बताती है कि साल के अंत तक यह पुराना रिकॉर्ड भी तोड़ सकती है।
अविश्वास की डिजिटल दीवार
काउंसलिंग के दौरान सामने आया है कि मोबाइल और सोशल मीडिया अविश्वास का सबसे बड़ा केंद्र बन गए हैं। पति-पत्नी एक ही कमरे में रहकर भी मोबाइल की आभासी दुनिया में व्यस्त रहते हैं। एक-दूसरे की बात सुनने के बजाय मोबाइल के नोटिफिकेशन पर ध्यान देना रिश्तों में कम्युनिकेशन गैप पैदा कर रहा है। इसी गैप से संदेह जन्म लेता है, जो अंतत: कोर्ट के दरवाजे तक ले जाता है।
मायके का दखल और सास-ससुर की उपेक्षा
रिश्तों में खटास की एक बड़ी वजह हस्तक्षेप भी है। काउंसलर बताते हैं कि करीब 20 फीसदी मामलों में लड़की के माता-पिता का ससुराल की छोटी-छोटी बातों में दखल देना विवाद को बढ़ा रहा है। सुबह उठते ही मां को ससुराल की रिपोर्ट देना और वहां से मिलने वाली प्रतिक्रिया घर में कलह का कारण बनती है। वहीं, सास-ससुर का ध्यान न रखना और परिवार से अलग रहने की जिद भी ईगो के टकराव को जन्म दे रही है।
युवाओं में घटता धैर्य
तलाक या भरण-पोषण के मामलों में सबसे ज्यादा संख्या 22 से 35 साल के युवाओं की है। इनमें धैर्य की कमी और मैं का भाव (ईगो) ज्यादा देखा जा रहा है। प्रेम विवाह करने वाले जोड़े भी इस संकट से अछूते नहीं हैं। कई मामलों में तो घरवालों के दबाव में की गई शादियां महज कुछ हफ्तों में ही टूट रही हैं।
भरण-पोषण व तलाक के बढ़ते केस
2019 595
2021 1212
2023 2446
2025 2700
2026 738 (मार्च तक)
एक्सपर्ट व्यू
पति-पत्नी घर में एक-दूसरे को समय नहीं दे पा रहे हैं। न सुनने की क्षमता है और न ही सामंजस्य बिठाने की इच्छा। अविश्वास और ईगो ही आज 45% विवादों की मुख्य जड़ है। रिश्तों को बचाने के लिए संवाद और समय बहुत जरूरी है।
हरीश दीवान, काउंसलर कुटुंब न्यायालय