
ग्वालियर. 1 जुलाई 2017 की मध्यरात्रि जब एक देश, एक टैक्स के ऐतिहासिक शंखनाद के साथ देश में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू हुआ था, तब दावा था कि तकनीक का यह अभेद्य दुर्ग कर चोरी के हर रास्ते को बंद कर देगा। सरकार का विश्वास था कि डिजिटल पारदर्शिता से एक ऐसा व्यापारिक वातावरण बनेगा जहां बेईमानी की कोई गुंजाइश नहीं होगी, लेकिन आज साल 2026 में जब हम इस व्यवस्था के नौ वर्षों के सफर का सिंहावलोकन करते हैं, तो हकीकत इन दावों के उलट खड़ी दिखाई देती है। नियमों को कसने, ढीला करने और सुधारने के नाम पर केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआइसी) अब तक 2,500 से अधिक नोटिफिकेशन (अधिसूचनाएं) जारी कर चुका है। विडंबना यह है कि जितने ज्यादा नियम बदले गए, शातिर दिमागों ने टैक्स चोरी के उतने ही नए रास्ते खोज निकाले। विभाग नियमों के जाल में उलझता गया और कर चोर लूपहोल्स का फायदा उठाकर तिजोरी साफ करते रहे।
मप्र में 3000 करोड़ का कर अपवंचन
मध्य प्रदेश में स्टेट जीएसटी (एसजीएसटी) और सेंट्रल जीएसटी (सीजीएसटी) के संयुक्त आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं। पिछले 9 वर्षों में प्रदेश में करीब 3,000 करोड़ रुपए से अधिक की टैक्स चोरी पकड़ी जा चुका है। सवाल लाजमी है कि जब हर तिमाही नियमों की नई खेप आ रही है, तो यह अभेद्य सिस्टम पस्त क्यों नजर आ रहा है?
डिजिटल सिस्टम को ही बनाया हथियार : हेराफेरी के नए पैंतर
कर चोरों ने अब पारंपरिक तौर-तरीके छोडकऱ डिजिटल सिस्टम को उसी के हथियार से मात देना शुरू कर दिया है:
कागजी फर्में, असली डाका : झुग्गी-झोपडिय़ों या बंद पड़े मकानों के पते पर फर्जी दस्तावेजों से जीएसटी रजिस्ट्रेशन लिए जा रहे हैं। बिना एक भी ट्रक हिलाए, करोड़ों का कागजी कारोबार कर असली इनपुट टैक्स क्रेडिट (आइटीसी) डकारा जा रहा है।
सर्कुलर ट्रेडिंग का मायाजाल : माल को भौतिक रूप से छुए बिना ए, बी, सी और डी कंपनियों के बीच बिलों का चक्रव्यूह रचा जाता है, जिसका मकसद टैक्स चोरी के साथ बैंकों से मोटा लोन ऐंठना भी है।
इ-वे बिल की री-साइक्लिंग : कैग की ऑडिट रिपोर्ट गवाह हैं कि लोहे के स्क्रैप, कोयला, सीमेंट और पान मसाले के लिए एक ही वैध इ-वे बिल का बार-बार इस्तेमाल कर माल ठिकाने लगाया जा रहा है।
वसूली पर सरकारी खाते में सन्नाटा : ग्राहकों से जीएसटी वसूल कर उसे सरकारी खजाने में जमा न करने और कंपोजीशन स्कीम का उल्लंघन कर दूसरे राज्यों में गुपचुप माल भेजने का खेल धड़ल्ले से चल रहा है।
ईमानदार बेहाल, माफिया निहाल
नियमों के इस महाजाल ने ईमानदारी से व्यापार करने वाले छोटे उद्यमियों के लिए फांस का काम किया है। मामूली तकनीकी त्रुटि पर उन्हें भारी पेनल्टी और नोटिस झेलने पड़ते हैं। वहीं, स्क्रैप, सीमेंट और गुटखा माफिया आज भी बिना पक्के बिल के नकद (कैश) में समानांतर अर्थव्यवस्था चला रहे हैं। हालांकि, इन 9 वर्षों में विभाग ने आइटीसी नियमों में सख्ती और इ-वे बिल की रियल टाइम ट्रैकिंग जैसे दो बड़े तकनीकी सुधार किए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर चुनौती अब भी बड़ी है।
मध्य प्रदेश के 3 बड़े महाघोटाले, जिन्होंने सिस्टम को हिलाया
घोटाला अनुमानित राशि मुख्य विवरण
इंदौर सिगरेट कांड: (2020) 105 करोड़+ रुपए बिना बिल और अघोषित रूप से सिगरेट की बड़ी खेप बाजार में खपाना (डीजीजीआइ की कार्रवाई)।
ऑपरेशन करक: 514 करोड़ रुपए पान मसाला, तंबाकू का अवैध सिंडिकेट और समानांतर फैक्ट्रियां चलाना।
बोगस फम्र्स घोटाला: 33.80 करोड़ रुपए फर्जी दस्तावेजों और बोगस आईटीसी के जरिए रिटर्न दाखिल करना (मामला हाईकोर्ट में)।
एक्सपर्ट व्यू : अब डेटा एनालिटिक्स से बचना नामुमकिन
जीएसटी के 9 वर्षों के सफर में सरकार ने टैक्स चोरी रोकने के लिए दो बड़े तकनीकी और नियमनकारी बदलाव किए हैं। पहला, आइटीसी नियमों में सख्ती, जिससे शेल कंपनियों द्वारा केवल कागजी बिल जारी कर फर्जी क्रेडिट लेने पर रोक लगाई जा सके। दूसरा, इ-वे बिल की रियल टाइम ट्रैकिंग और निगरानी, ताकि एक ही बिल के बार-बार इस्तेमाल और माल के अवैध परिवहन को पकड़ा जा सके। हालांकि, शातिर व्यापारी अब भी इन डिजिटल सिस्टम में लूपहोल्स ढूंढ रहे हैं। डेटा एनालिटिक्स और एआइ के इस दौर में कर चोरी करना अब मुमकिन नहीं होगा। व्यापारियों को केवल वास्तविक लेनदेन के आधार पर ही अनुपालन करना चाहिए, अन्यथा भारी जुर्माने के साथ गंभीर कानूनी कार्रवाई तय है।
सीए पंकज शर्मा