हनुमानगढ़

जब राजस्थान में हाथ उठाकर और रस्सी के आर-पार खड़े होकर चुने जाते थे सरपंच, पढ़िए 1960 के दौर का दिलचस्प किस्सा

राजस्थान में 1960 के दौर में पंचायती राज चुनाव बेहद अनोखे होते थे। न EVM थी, न पर्ची और न ही प्रचार का शोर। 96 वर्षीय हरिश्चंद्र और 85 वर्षीय बनवारीलाल के अनुसार, चौपाल में हाथ उठवाकर या मैदान के बीच रस्सी बांधकर उसके दोनों तरफ मतदाताओं को खड़ा करके सरपंच चुना जाता था।
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Updated: 23 Oct 2026, 1:25 PM IST
how sarpanches were elected in rajasthan in 1960 news
हाथ उठाकर मतदान-चौपाल में और रस्सी द्वारा मतदान-रेखा पार कर चुनाव (फोटो-एआई)

Rajasthan Sarpanch Election in 1960: चारणवासी (हनुमानगढ़): पंचायतीराज व्यवस्था की शुरुआत सादगी, पारदर्शिता और आपसी भाईचारे की मिसाल के रूप में याद की जाती है। साल 1960 में जब राजस्थान में पंचायतीराज संस्थाओं के प्रथम चुनाव शुरू हुए, उस समय न तो गुप्त मतदान की प्रक्रिया थी और न ही मतपत्रों व ईवीएम का दौर था। क्षेत्र के वयोवृद्ध ग्रामीणों ने उस दौर की दिलचस्प चुनावी यादें साझा करते हुए यह जानकारी दी।

उस दौर में ऐसे विजयी घोषित किए जाते थे प्रत्याशी

फेफाना गांव के 96 वर्षीय हरिश्चंद्र गोदारा और चक जोशियों की ढाणी के 85 वर्षीय बनवारीलाल जोशी ने बताया कि 1960 के दशक में गांव के चुनाव बेहद साधारण तरीके से आयोजित किए जाते थे। उस समय चुनाव कराने के दो प्रमुख तरीके अपनाए जाते थे। पहले तरीके में गांव के सभी लोगों को चौपाल या खुले मैदान में इकट्ठा किया जाता था। इसके बाद चुनावी मैदान में उतरे प्रत्याशियों के नाम पुकारे जाते थे। चुनाव अधिकारी समर्थकों से कहते थे कि प्रत्याशी के पक्ष में वोट देने वाले अपना हाथ ऊंचा करें, जिस प्रत्याशी के समर्थन में सबसे अधिक हाथ उठते, उसे विजयी घोषित कर दिया जाता था।

एक तरीका यह भी था उस दौर में चुनाव का

दूसरा तरीका और भी दिलचस्प था। मैदान के बीचों-बीच एक रस्सी बांध दी जाती थी और उसके दोनों तरफ प्रत्याशियों को खड़ा कर दिया जाता था। जो मतदाता जिस प्रत्याशी का समर्थन करना चाहता, वह रस्सी पार करके उस प्रत्याशी की तरफ जाकर खड़ा हो जाता था। जिस प्रत्याशी के पाले में ज्यादा लोग खड़े होते, चुनाव परिणाम उसी के पक्ष में चला जाता था।

चारणवासी: वयोवृद्ध हरिश्चंद्र गोदारा और बनवारीलाल जोशी

नाममात्र का खर्च, लोग ही करते थे इंतजाम

बुजुर्ग हरिश्चंद्र गोदारा और बनवारीलाल जोशी बताते हैं कि उस जमाने में चुनाव प्रचार और खर्च नाममात्र का होता था। प्रत्याशी बिना किसी तामझाम के घर-घर जाकर सादगी से हाथ जोड़कर वोट मांगते थे। न लाउडस्पीकर का शोर होता था और न ही बैनर-पोस्टर पर खर्च होता था। गांव के लोग ही आपस में मिलकर चाय-पानी का इंतजाम करते थे। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के बावजूद आपसी भाईचारा पूरी तरह कायम रहता था।

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23 Oct 2026, 1:25 PM IST
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