इन समस्याओं के बिकराल होने से पहले निपटने के लिए कर रहे थे कोशिश
होशंगाबाद। आध्यात्मिक संत भय्यू महाराज ने खुद को गोली मारकर जान देने से पहले पांच चिंताएं व्यक्त की थी। वह इनके निराकरण की दिशा मेंं काम भी कर रहे थे। साथ ही लोगों को प्रेरित भी कर रहे थे कि बिकराल होने से पहले उनके साथ वे भी इन समस्याओं के निराकरण की दिशा मेंं कदम उठाएं। उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर भी इन समस्याओं को लेकर चिंता जाहिर की थी। लेकिन मंगलवार को उन्होंने ऐसा कदम उठाया कि उनका अनुशरण करने वाले दंग रह गए।
नर्मदा नदी से था लगाव
संत भय्यू महाराज को मां नर्मदा से भी बेहद लगाव था। उन्होंने उसकी दुर्दशा को लेकर एक रिपोर्ट भी तैयार की थी। महाराज ने होशंगाबाद के सेठानी घाट पर भी आकर पूजा-अर्चना की थी। नर्मदा पुरम के बैतूल शहर में ही वे मई में आने वाले थे, लेकिन अचानक स्वास्थ्य खराब हो जाने के कारण ऐन वक्त पर उनका आने का कार्यक्रम रद्द हो गया था।
इसलिए थे चिंतित
1. जल संवर्धन एवं संधारण: भय्यू महाराज की पहली चिंता यह थी। वे कहते थे- कृषि व हमारे जीवन के स्थायित्व व अस्तित्व के लिए जल संवर्धन व संधारण अति आवश्यक है, जिसके लिए युद्ध स्तर पर प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। इसके लिए वे प्रयासरत भी थे। अब तक 1257 तलाबों का निर्माण करा चुके थे। उनके सूर्योदय परिवार द्वारा इस दिशा में वर्षो से कई प्रयास किये जा रहे हैं। जिसमें रेन वाटर हार्वेस्टिंग, तालाबों का निर्माण व गहरीकरण, नहरों का निर्माण प्रमुख हैं।
2. खाद्य पदार्थों में मिलावट: भय्यू महाराज ने खाद्य पदार्थों पर भी चिंता जताई थी। उनका कहना था कि देश में किसान की मेहनत से उगने वाला अन्न बेहतर होता। आज इनमें मिलावट होने से दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। उन्होंने उत्पादन की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए कहा था कि 50 वर्ष पूर्व के खाद्यानों की गुणवत्ता और आज की गुणवत्ता के स्तर में काफी कमी आई है। इसका प्रमुख कारण रासायनिक खाद व दवाइयों का उपयोग होना है। उन्होंने किसानों को कृषि व ग्रामीण जीवन संबंधी मार्गदर्शन देकर कृषि भूमि को बेहतर बनाने के लिए कार्य करने का संकल्प लिया। कृषकों को उन्नत एवं समृद्ध बनाने के लिए ट्रस्ट द्वारा 950 गांवों में यह अभियान चलाया गया।
3. बाल श्रम नासूर : भय्यू महाराज का मानना था कि भारतवर्ष में बच्चों को ईश्वर का रूप माना जाता है। भारत की धरती ध्रव, प्रह्लाद, लव-कुश एवं अभिमन्यु जैसे बाल चरित्रों से पटी है। लेकिन वर्तमान में बच्चों का भविष्य अंधकारमय होता जा रहा है। खासकर गरीब बच्चों का। वे स्कूल छोड़कर बाल-श्रम के लिए मजबूर हैं। इसलिए कहा था कि आइये हम सभी संकल्पित होकर बाल मजदूरी के खिलाफ आवाज बुलंद करें।
4. अपराध और अपराधी: वे अध्यात्म व शिक्षा के माध्यम से जेलों में अपराध की सजा काट रहे अपराधियों में सकारात्मक बदलाव लाना चाहते थे। उनका मानना था कि प्रत्येक व्यक्ति में अवगुण एवं सद्गुण दोनों होते है। अवगुणों के प्रभाव में आकर व्यक्ति अपराध करता है, परन्तु कुछ समय पश्चात् उसे अपने अपराध का बोध होने पर पश्चाताप भी होता है, वे ईश्वर से क्षमा याचना करते है। बहुत से बंदी बंदीगृह में ही अपनी आदतों में सुधार कर लेते है। बंदीगृह में यदि बंदियों को अध्यात्मिक साहित्य, सामाजिक उत्थान का साहित्य पडऩे के लिए दिया जाता है जो उनकी मानसिकता में परिवर्तन होता है और वे बंदीगृह में रहकर भी अच्छा कार्य करते है। इसके लिए वे जेलों में कम्प्यूटर केंद्रों एवं धार्मिक वाचनालाओं स्वास्थ एवं योग शिविर भी आयोजित करने की पैरवी करते थे।
5.पर्यावरण: वे पर्यावरण की समस्या और इससे प्राकृतिक असंतुलन को लेकर चिंतित थे। ग्लोबल बर्मिंग के दुष्परिणामों को देखते हुए वृक्ष संवर्धन की आवश्यकता बताई थी। अब तक 53 राष्ट्र चेतना महा पर्यावरण यज्ञ आयोजित किये, जिसके तहत 3 लाख 15 हजार 853 देव वृक्षों के पौधों का रोपण किया गया। उनका कहना था कि प्रदूषण से जन जीवन प्रभावित हो रहा है। मनुष्य से लेकर अन्य किट पतंगों व पशु-पक्षियों की प्रजातियाँ समाप्त हो रही है। मनुष्य का अस्वस्थ होने का मुख्य कारण यही है। प्राकृतिक असंतुलन नृत्य बढता जा रहा है। हम प्रकृति के तांडव से बचें इस हेतु हमें अधिक से अधिक पेड़ लगाने होंगे।