कर्नाटक के दावणगेरे के निवासी डॉ. सुरेश हनगवाड़ी उन असाधारण व्यक्तित्वों में शामिल हैं, जिन्होंने गंभीर शारीरिक चुनौती को अपने जीवन की कमजोरी नहीं, बल्कि समाज सेवा की ताकत बनाया। 70 प्रतिशत हीमोफीलिया से पीडि़त होने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और अपने अनुभव को आधार बनाकर दिव्यांगजनों के अधिकार, जागरूकता और बेहतर देखभाल […]
कर्नाटक के दावणगेरे के निवासी डॉ. सुरेश हनगवाड़ी उन असाधारण व्यक्तित्वों में शामिल हैं, जिन्होंने गंभीर शारीरिक चुनौती को अपने जीवन की कमजोरी नहीं, बल्कि समाज सेवा की ताकत बनाया। 70 प्रतिशत हीमोफीलिया से पीडि़त होने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और अपने अनुभव को आधार बनाकर दिव्यांगजनों के अधिकार, जागरूकता और बेहतर देखभाल के लिए जीवन समर्पित कर दिया। उनके इसी प्रेरक योगदान के लिए उन्हें अब पदमश्री से नवाजे जाने की घोषणा की गई है।
संघर्ष और जीवन यात्रा
हीमोफीलिया जैसी गंभीर बीमारी के साथ जीवन जीना आसान नहीं होता। बार-बार की चिकित्सकीय जटिलताएं, सामाजिक असहजता और सीमित संसाधन इन सबके बीच डॉ. हनगवाड़ी ने शिक्षा और सेवा को अपना मार्ग चुना। उन्होंने न केवल अपनी स्थिति को समझा, बल्कि उसी अनुभव को समाज के लिए उपयोगी बनाया। उनका मानना रहा कि जानकारी और संवेदनशीलता के अभाव में ही दिव्यांगजन सबसे अधिक उपेक्षा का शिकार होते हैं।
सेवा और योगदान
डॉ. सुरेश हनगवाड़ी ने हीमोफीलिया और दिव्यांगता से जुड़े मुद्दों पर जागरूकता बढ़ाने, समय पर उपचार, परामर्श और सामाजिक स्वीकार्यता के लिए निरंतर कार्य किया। वे परिवारों को यह समझाने में जुटे रहे कि सही जानकारी, चिकित्सा सहयोग और आत्मविश्वास से दिव्यांगता को भी सार्थक जीवन में बदला जा सकता है। उनके प्रयासों से अनेक दिव्यांगजन और उनके परिवारों को नई दिशा और आशा मिली।
प्रेरणा का संदेश
डॉ. सुरेश हनगवाड़ी की कहानी बताती है कि शारीरिक सीमाएं किसी के सपनों और सेवा-भाव को सीमित नहीं कर सकतीं। उन्होंने अपने संघर्ष को ही अपनी प्रेरणा बनाया और दूसरों के लिए उम्मीद की किरण बने। आज वे न केवल कर्नाटक, बल्कि पूरे देश में दिव्यांग सशक्तिकरण के क्षेत्र में एक प्रेरणादायी नाम हैं।