हुबली

कर्नाटक के सौंदत्ती का रेणुका माता मंदिर: राष्ट्रकूट और चालुक्य राजवंशों की सुंदर वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण

रायबाग के बोमप्पा नायक ने 1514 में करवाया था मंदिर का निर्माण

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सौंदत्ती स्थित रेणुका माता मंदिर।

कर्नाटक के बेलगावी जिले के सौंदत्ती स्थित प्रमुख मंदिर येल्लम्मा देवी मंदिर राष्ट्रकूट और चालुक्य राजवंशों की सुंदर शिल्पकला और वास्तुकला की शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। मंदिर के आसपास मिले पुरातात्विक साक्ष्यों के अनुसार आठवीं शताब्दी के मध्य से ग्यारहवीं शताब्दी के मध्य तक यहां एक मंदिर मौजूद था। पहाड़ी के बीच स्थित यह मंदिर पहले सिद्धाचल या रामगिरी पर्वत के नाम से जाना जाता था। अब इसे येलम्मा गुड्डा के नाम से भी जाना जाता हैं। यह देवी हिंदू पूजा स्थल की सबसे पूजनीय देवी में से एक है। मंदिर की देवी को जगदम्बा के नाम से भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है ब्रह्मांड की मां और माना जाता है कि वे काली का एक रूप हैं। देवी काली के अवतार येल्लम्मा देवी को देवी रेणुका के नाम से भी जाना जाता है। एकवीरा, एलामा एवं एला अम्मन के नाम से भी जानते हैं। ऐसा माना जाता है कि मंदिर का निर्माण1514 में रायबाग के बोमप्पा नायक ने करवाया था। मालाप्रभा नदी के पास स्थित मंदिर के आसपास एकनाथ, परशुराम, सिद्धेश्वर, गणेश और मल्लिकार्जुन सरीखे अन्य देवता भी विराजमान हैं।

दिया था वरदान
देवी येल्लम्मा राजा रेणुका की पुत्री थीं। उनका विवाह जमदग्नि से हुआ था। जमदग्नि बहुत ही क्रोधी व्यक्ति थे। उन्होंने भगवान की तपस्या करके सर्वोच्च शक्तियां प्राप्त की थीं। रेणुका के पांच पुत्र थे। रामभद्र सबसे छोटे थे और उन्हें भगवान विष्णु का अवतार माना जाता था जिन्हें परशुराम के नाम से भी जाना जाता था। जमदग्नि ने रेणुका को वरदान दिया कि जब तक उनका सतीत्व शुद्ध रहेगा, वह कच्चे मिट्टी के बर्तन में पानी ला सकेंगी। ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार, एक बार रेणुका कुछ पानी लाने के लिए नदी के तट पर गई तो उसने कुछ गंधर्वों को नदी में खेलते हुए देखा। एक पल के लिए वह अपने पति से विचलित हो गई और एक गंधर्व पर मोहित हो गई। एक अन्य किंवदंती यह भी है कि वहां उसने शाल्व राज्य के राजा को पानी में अपनी रानी के साथ प्रेम करते देखा। वह इस दृश्य की सुंदरता से मंत्रमुग्ध हो गई लेकिन उसका सतीत्व टूट गया। जब तक वह पानी लेकर अपने पति के आश्रम पहुंचील तब थके हुए जमदग्नि ने उसकी देरी का कारण जाना तो वह क्रोधित हो गए और अपने सभी बेटों से अपनी मां को मार डालने के लिए कहा। चार बड़े बेटों ने ऐसा करने से मना कर दिया लेकिन परशुराम ने अपने पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए अपनी मां का सिर कुल्हाड़ी से काट दिया।

सिर को जोड़ फिर किया जीवित
ऋषि ने अपने चार बड़े बेटों को उनकी अवज्ञा के कारण जंगलों में निर्वासित कर दिया और परशुराम की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्होंने वरदान मांगने के लिए कहा। परशुराम ने बुद्धिमानी से अपनी मां के जीवन की कामना की और यह वरदान उन्हें प्रदान किया गया। जमदग्नि ने अपनी शक्तियों का उपयोग करके रेणुका का सिर उसके शरीर से जोड़ दिया और वह फिर से जीवित हो गई। एक अन्य किंवदंती बताती है कि अपनी मां को फिर से जीवित देखने की जल्दी में उन्होंने एक काली चमड़ी वाली महिला का सिर लिया और उसे अपनी मां के शरीर से जोड़ दिया। इसी कारण रेणुका को येल्लम्मा भी कहा जाता है। अन्य किंवदंतियों में बताया गया है कि जब उनका सिर काटा गया, तो रेणुका के सिर सैकड़ों गुना बढ़ गए और भारत के विभिन्न क्षेत्रों में चले गए।

मां के प्रति अगाध आस्था
राजस्थान के बालोतरा जिले के पादरड़ी निवासी वीरमसिंह भायल कहते हैं, भक्तों में मां के प्रति अगाध आस्था है। कर्नाटक के विभिन्न जिलों के साथ ही आसपास के प्रदेशों से रोजाना सैकड़ों-हजारों भक्त दर्शन के लिए मां के दरबार में पहुंचते हैं।

हर मनोकामना होती हैं पूरी
राजस्थान के बालोतरा जिले के मायलावास निवासी वगतावरसिंह राजपुरोहित कहते हैं, देवी रेणुका माता का भारी परचा है। सच्चे मन से मां से मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है। यही वजह है कि मां का यह मंदिर इतना अधिक प्रसिद्ध है।

Updated on:
09 Oct 2024 06:23 pm
Published on:
09 Oct 2024 04:59 pm
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