चातुर्मास का हमारे जीवन में महत्व विषयक राजस्थान पत्रिका परिचर्चा
जैन धर्म में चातुर्मास का बड़ा महत्व है। इन चार महीनों में जैन संत एक ही स्थान पर रहकर साधना और पूजा पाठ करते हैं। साथ ही इस दौरान सूक्ष्म जीव ज्यादा पैदा होते हैं, जिससे मनुष्यों के ज्यादा चलने या उठने बैठने से जीवों की हत्या होती है। इसलिए जैन संत इन चार महीनों के लिए एक ही जगह ठहर जाते हैं। साथ ही ध्यान और साधना करते हैं। इसी चातुर्मास में पर्युषण पर्व भी मनाया जाता है। भारत धर्म प्रधान देश है। इसके सभी धर्मों में अपने-अपने ढंग से साधना-पद्धतियां, मान्यताएं और आचार प्रणालियां प्रचलित हैं, जो मानव जीवन के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इन धार्मिक पद्धतियों को अपने-अपने ढंग से निर्वहन करने का अपना-अपना क्षेत्र और मार्ग है, जिसमें चातुर्मास की परंपरा महत्वपूर्ण है। जैन धर्म में चातुर्मास एक आध्यात्मिक पर्व है। यह किसी बाह्य क्रिया कांड का नाम नहीं, अपितु जीवन जीने की कला का पर्व है। जैन धर्म में चातुर्मास कोई औपचारिकता नहीं अपितु यह जीवन निर्माण का एक अवसर प्रदान करता है। चातुर्मास को वर्षावास भी कहते हैं। वर्षा ऋतु के कारण जलभराव से जंतुओं की उत्पत्ति अधिक हो जाती है। उनकी रक्षा के लिए तथा धर्म-साधना के लिए चातुर्मास करने का शास्त्रीय विधान है। जैन धर्म में यह परंपरा अत्यंत प्राचीन है। भगवान महावीर ने स्वयं चातुर्मास किए थे। भगवान महावीर ने अपने चातुर्मासों में जीव, जगत और निर्वाण आदि अत्यंत गहन विषयों पर गवेषणा की थी। चातुर्मास में महापर्व संवत्सरी का आगमन भी होता है। यह एक अलौकिक पर्व है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में रहते व्यापार तथा व्यवहार में अनेक भूलें हो जाती हैं। उन भूलों के लिए परस्पर क्षमा याचना करना संवत्सरी पर्व का मूल ध्येय है। चातुर्मास के महात्म्य को लेकर राजस्थान पत्रिका परिचर्चा में बालिकाओं एवं युवतियों ने अपने विचार रखे। प्रस्तुत हैं उनके विचार:
जीव दया का पालन
चौराऊ निवासी करीना मलानी ने कहा, चातुर्मास के समय जीवदया का पालन होता है। श्रावक-श्राविकाएं धर्म-आराधना के लिए जुटते हैं। वयावच का लाभ मिलता है। आराधना के साथ आध्यात्मिक आराधना भी होती है। चातुर्मास के दौरान जीवदया अधिक होती है।
मिलती हैं आंतरिक शांति
सिरोही निवासी कृषि जैन ने कहा, चातुर्मास यानी चार महीने का वह समय जब सभी भक्ति की ओर बढ़ते हैं। इस दौरान आंतरिक शांति एवं आनन्द को खोजने का अवसर मिलता है। चातुर्मास का समय ज्ञान एवं भक्ति का समय होता है। यह परमात्मा से जुडऩे का अवसर है।
एक स्थान पर स्थिरता
चौराऊ निवासी ईशा मलानी ने कहा, चातुर्मास के समय साधु-साध्वियों की एक स्थान पर स्थिरता रहती है। इन चार महीनों में वर्षा अधिक होती है। इस कारण अधिक जीवों की उत्पत्ति भी होती है। ऐसे में किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं हो, इस कारण साधु-साध्वी विहार नहीं करते।
युवाओं का हो रहा जुड़ाव
पाडीव निवासी साक्षी शाह ने कहा, इस बार पन्यास परमयश विजय महाराज की स्थिरता मिली हैं। आत्मा एवं शरीर अलग हैं, इसका ज्ञान दे रहे हैं। चातुर्मास में इस बार बड़ी संख्या में युवाओं का जुड़ाव हुआ है। उनमें परिवर्तन महसूस हो रहा है। रात्रि भोजन एवं कन्द-मूल फल त्याग सरीखे छोटे नियम ले रहे हैं।