इंदौर

शर्त लगाने की आदत में उलझी जिंदगियां

सतत रंग समूह की कमजोर नाट्य प्रस्तुति
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Mar 10, 2019
indore
शर्त लगाने की आदत में उलझी जिंदगियां

इंदौर. द्यशहर के नए थिएटर ग्रुप सतत रंग समूह ने शनिवार शाम नाटक बाजी का मंचन किया। अविनाश चंद्र मिश्र के लिखे इस नाटक को गोविंदराम सेकसरिया मैंनेजमेंट इंस्टिट्यूट के सभागार में रानी जॉर्ज के निर्देशन में मंचित किया। जो नाट्यप्रेमी इस नाटक को देखने शहर से दूर इस सभागृह में पहुंचे वे निराश ही हुए, क्योंकि एक सशक्त कथानक की यह कमजोर प्रस्तुति रही। नाटक का कथासार यह है कि एक विशाल बंगले में रहने वाले रइस आदमी गोयल को बात-बात पर शर्त लगाने की आदत है। बंगले में हो रही एक पार्टी में उसके वकील मित्र का सहायक युवा वकील नीरज सक्सेना पहुंचता है।

वहां गोयल और सक्सेना फांसी की सजा या उम्रकैद की बात पर बहस होती है। गोयल का कहना है कि तिल-तिलकर उम्रकैद काटने के बजाय फांसी बेहतर है और मैं शर्त लगा सकता हु कि अगर मैं किसी व्यक्ति को पांच साल कैद में रहने के लिए 10 करोड़ भी दूं, तो भी वह कैद में रहना पसंद नहीं करेगा। नीरज सक्सेना कहता है कि अगर आप मुझे 20 करोड़ दें तो मैं 10 साल की कैद भुगतने को तैयार हूं। गोयल के एक पत्रकार मित्र की मौजूदगी में शर्त के नियम तय होते हैं, जिसके मुताबिक गोयल के बंगले के एक कमरे में ही नीरज को कैद भुगतना होगी। कैद में उसे फोन व टीवी नहीं, लेकिन किताबें दी जाएंगी।

गोयल की उम्मीदों के विपरीत नीरज कैद भुगत लेता है, लेकिन कैद पूरी होने कुछ वर्ष पहले गोयल को बिजनेस में घाटा होने लगता है। हालत यह हो जाती है कि 20 करोड़ देने के लिए उसे बंगला बेचना पड़ता है। बंगला बेचने से पहले वह नीरज की हत्या की कोशिश भी करता है। अंत में नीरज कैद पूरी होने से कुछ पहले कैद से बाहर आकर 20 करोड़ का चेक गोयल को वापस कर देता है, क्योंकि अब उसे यह सब व्यर्थ लगता है।

बेहद सपाट प्रस्तुति
इस कहानी को मंच पर बेहद सपाट तरीके से पेश किया गया। गोयल के रूप में देवेंद्र मुजाल्दे, नीरज के रूप में अबीर शर्मा, पत्रकार के रूप में कमलकांत पटेल, गोयल की पत्नी की भूमिका में योगिता परमार सहित सभी कलाकार सपाट अभिनय करते रहे। संवादों में वॉइस मॉड्यूलेशन तो था ही नहीं। श को स और व को ब बोलना बहुत अखर रहा था।

मंच सज्जा भी फीकी
मंच सज्जा का जहां तक प्रश्न है तो मंच पर विशाल बंगले का कोई फील नहीं आया, जबकि सारा घटनाक्रम उसी में घटित होता है। समूह के पास संसाधनों की कमी को समझा जा सकता है, लेकिन कल्पनाशील नाट्य युक्तियों के इस्तेमाल से यह कमी पूरी की जा सकती थी। दृश्य रचना इतनी सपाट थी कि सभी पात्र एक पंक्ति में खड़े या बैठे रहते हैं।

गुजराती नाटक में दिखी बहू की फिजूलखर्ची
गुजराती हास्य नाटक बहू हाई-फाई, सासू वाई-फाई का मंचन
गुजराती समाज परिसर नसिया में शनिवार की रात गुजराती हास्य नाटक बहू हाई-फाई सासू वाई-फाई का मंचन किया गया। मुंबई से आए कलाकारों ने यहां इम्तियाज पटेल के लिखे इस नाटक को अजीत गौर के निर्देशन में पेश किया। नाटक में दिखाया गया है कि एक फैशनेबल लडक़ी किसी परिवार में बहू बनकर जाती है। वहां उसकी बेवजह शॉपिंग कर फिजूलखर्ची करने की आदत से उसकी सास परेशान है। इस बात पर सास-बहू में नोक-झोंक होती रहती है और हास्य के प्रसंग बनते रहते हैं।

बहू की फिजूलखर्ची बढ़ती चली जाती है, सास की बचत करने की सलाह पर वह ध्यान नहीं देती। घटनाक्रम कुछ ऐसा घूमता है कि एक दिन बहू को गलती का अहसास होता है और फिर सुखद अंत होता है। नाटक में मुख्य भूमिकाएं प्रतिमा टी, उमंग आचार्य, दीपा त्रिवेदी, रिदम भट्ट, प्रकाश जोशी और विमल त्रिवेदी ने निभाईं।
नसिया परिसर में हुए हास्य नाटक का लुत्फ उठाने के लिए लिए बड़ी संख्या में समाजजन पहुंचे।

Updated on:
10 Mar 2019 02:16 pm
Published on:
10 Mar 2019 02:16 pm