
Indore High Court: अदालत ने बढ़ाया गुजारा भत्ता (Photo Source: AI Image)
Indore High Court news: मध्यप्रदेश में इंदौर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश पलटते हुए कहा कि भरण-पोषण की कार्यवाही क्रिमिनल केस नहीं है, जिसमें साबित करने की जिम्मेदारी दूसरे पर डाली जाए। यह सामाजिक कल्याण से जुड़ा मामला है, इसलिए पति की आय साबित करने का पूरा बोझ पत्नी पर नहीं डाला जा सकता।
ट्रायल कोर्ट को पति पर अपनी वास्तविक आय व आर्थिक स्थिति का खुलासा करने का दायित्व डालना चाहिए था। जस्टिस गजेंद्र सिंह की कोर्ट ने आदेश में कहा कि पति आय के स्रोत को छिपा सकता है, लेकिन सामाजिक हैसियत और जीवन-स्तर को नहीं। वह पत्नी और बच्चे का उनके जीवन-स्तर अनुरूप भरण-पोषण करने की जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।
हाईकोर्ट में दायर याचिका मुताबिक, महिला का विवाह 6 मई 2013 को हुआ और 11 अक्टूबर 2015 को पुत्र का जन्म हुआ। वर्ष 2024 में पत्नी ने दहेज प्रताड़ना, मारपीट, आर्थिक शोषण के आरोप लगाते हुए भरण-पोषण को निचली अदालत में आवेदन लगाया। पत्नी का दावा था कि उसका पति एमटेक और एमबीए है। निजी कंपनी में डीजीएम है। उसने पति की आय व संपत्ति का हवाला देते हुए स्वयं और बच्चे के लिए तीन लाख रुपए प्रति माह भरण-पोषण की मांग की थी।
फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया था कि वह बिना पर्याप्त कारण पति से अलग रह रही है। कोर्ट ने बच्चे के लिए 20 हजार रुपए माह भरण-पोषण मंजूर किया था। हाईकोर्ट ने इस फैसले को गलत बताते हुए टिप्पणी की कि पत्नी द्वारा पति के खिलाफ दर्ज दहेज प्रताड़ना और मारपीट की एफआइआर मौजूद है।
कोर्ट ने पत्नी की आय संबंधी दलीलों को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उसकी आय का कोई ठोस प्रमाण नहीं है और लंबे वैवाहिक जीवन तथा 10 वर्षीय बच्चे की परवरिश कर रही पत्नी के बारे में यह मान लेना कि वह स्वयं कमाकर गुजारा कर सकती है, कानून के हिसाब से ठीक नहीं है।
हाईकोर्ट ने पत्नी को 30 हजार और नाबालिग बेटे को दिए जाने वाले 20 हजार के गुजारा-भत्ता को बढ़ाकर 30 हजार रुपए प्रतिमाह कर दिया। कोर्ट ने इसे निचली अदालत में आवेदन लगाने की तारीख से देने के आदेश दिए। जो राशि पहले दी है, उसे समायोजित करने को भी कोर्ट ने कहा।
बीते दिनों पहसे पति से अलग रह रही गर्भवती महिला को हाईकोर्ट ने आखिरकार गर्भ समाप्त करने की अनुमति दे दी है। जस्टिस सुबोध अभ्यंकर की कोर्ट ने महिला द्वारा दायर याचिका का निराकरण करते हुए टिप्पणी की कि जब महिला वैवाहिक विवाद और गंभीर मतभेदों के कारण गर्भावस्था जारी नहीं रखना चाहती, तो उसकी इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिए। कोर्ट ने एमवायएच को गर्भपात के लिए जल्द चिकित्सकीय प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश भी दिए हैं।
Updated on:
07 Jul 2026 02:15 pm
Published on:
07 Jul 2026 02:14 pm
