बहुरूप गांधी पोस्टर प्रदर्शनी में दर्शकों ने देखें बापू के कई रूप
इंदौर. महात्मा गांधी ने भारत जैसे विशाल देश को केवल भाषण देकर ही आंदोलित नहीं किया, बल्कि देश के आम आदमी का जीवन खुद जीकर देखा और हर तरह से खुद को आत्मनिर्भर बनाया। उनके कई रूपों पर केन्द्रित रूपांकन की दो दिवसीय पोस्टर प्रदर्शनी बहुरूप गांधी सोमवार से प्रीतमलाल दुआ आर्ट गैलरी में शुरू हुई। जानी-मानी गांधीवादी पुष्पा बेन ने उद्घाटन किया। पोस्टर्स पर अशोक दुबे ने केलिग्राफी की और रेखांकन भारती सरवटे के हैं। अशोक दुबे ने बताया, पोस्टर्स में लिखे गए तथ्या डीजी तेंदुलकर की पुस्तक महात्मा और अनु बंद्योपाध्याय की पुस्तक बहुरूप गांधी से लिए गए हैं।
नाई
द. अफ्रीका में रंगभेद के चलते एक बार अंग्रेज नाई ने उनके बाल काटने से मना किया तो उन्होंने खुद ही बाल काटना सीख लिया। भारत में उनके आश्रमों में सभी सदस्य एक-दूसरे के बाल काटते थे।
दर्जी
गांधी कई बार भारी मशीनरी का विरोध करते, लेकिन सिलाई मशीन को उन्होंने उपयोगी पाया। उन्होंने जेल में रहने के दौरान सिलाई मशीन चलाना और कपड़ों की कटिंग सीखी। वे कस्तूरबा के वस्त्र खुद ही सिलते थे।
कतैया और बुनकर
चरखे को आजादी के आंदोलन का प्रतीक बनाने वाले महात्मा गांधी अंतिम समय तक सूत कातते रहे।
सफाईकर्मी
द. अफ्रीका से ही उन्होंनें संडास साफ करने का काम शुरू कर दिया था। भारत लौटे तो कांग्रेस के कोलकात अधिवेशन में संडास खुद साफ कर कार्यकर्ताओं को प्रेरित किया। उनके आश्रमों में सभी आश्रमवासी बारी-बारी से सफाईकर्मी का काम करते थे।
मोची
द. अफ्रीका में एक जर्मन दोस्त से महात्मा गांधी ने चप्पल बनाना सीखा। बाद में सेवाग्राम में आश्रमवासियों को भी इस काम की ट्रेनिंग दी।
रसोइया
लंदन में पढ़ाई के दौरान जब वहां शाकाहारी भोजन नहीं मिला तो खुद ही स्टोव पर खाना बनाना शुरू कर दिया। यह काम उन्होंने भारत में भी जारी रखा। सेवाग्राम में कई बार आश्रमवासियों को खुद खाना बनाकर खिलाते।
चिकित्सक
प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेद की कई किताबें पढऩे के बाद वे खुद का और आश्रमवासियों का इलाज करने लगे। यहां तक कि एक बार कस्तूरबा की प्रसूति भी खुद उन्होंने ही की।
शिक्षक
शिक्षण की शुरुआत द. अफ्रीका में निरक्षर कस्तूरबा को अंग्रेजी, हिन्दी, गणित पढ़ाकर की। वहां फीनिक्स आश्रम में भारतीय मूल के बच्चों को वे अंग्रेजी पढ़ाते थे। वे किताबी ज्ञान के बजाय व्यावहारिक ज्ञान पसंद करते थे। वर्धा में सांप बहुत निकलते थे तो सपेरों से सांप पकडऩा सीखा और पकडक़र उन्हें दूर छोड़ आते।