आरक्षण के बाद आदि शंकराचार्य की दीक्षास्थली का विवाद गहराया
जबलपुर। प्रदेश में आरक्षण के मसले को लेकर नाराज चल रहे ब्राम्हणों का गुस्सा अभी शांत भी नहीं हुआ था कि अब एक और विवाद ने उनकी सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ा दी है। नया मामला आदि शंकराचार्य की दीक्षास्थली की घोषणा से जुड़ा है। राज्य सरकार ने हाल ही में ओंकारेश्वर को शंकराचार्य की दीक्षा भूमि बताते हुए वहां पर उनकी 108 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू की है। इस फैसले का ब्राम्हण समाज का एक वर्ग विरोध कर रहा है। उनका आरोप है कि मप्र सरकार ने आदि गुरु शंकराचार्य की दीक्षा स्थली बदल दी है। जहां मूर्ति की स्थापना की जा रही है वह उनकी वास्तविक दीक्षाभूमि नहीं है। इससे नाराज ब्राम्हण महासभा ने सरकार के खिलाफ प्रदेशभर में आंदोलन शुरू करने की चेतावनी है।
सरकार ने गलत किया
मप्र प्रगतिशील ब्राह्मण महासभा व सर्वजातीय मंच ने आरोप लगाया है कि मप्र सरकार ने आदि गुरु शंकराचार्य की दीक्षा स्थली बदलकर गलत किया है। दोनों का संगठनों का आरोप है कि सरकार ने न केवल दीक्षास्थल बदल दिया बल्कि उनका जन्म वर्ष तक अपनी अधिसूचना में बदल दिया। इसे घोर पाप बताते हुए महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष आदर्शमुनि त्रिवेदी ने ओंकारेश्वर में दीक्षास्थली अधिसूचित किए जाने के फैसले पर आपत्ति जताई है।
बरमान घाट के पार गुफा
ब्राम्हण समाज का एक वर्ग यह दावा करता आया है कि आदि शंकराचार्य की दीक्षा भूमि नरसिंहपुर जिले में है। जहां, बरमान घाट के पार आज भी आदि गुरु की दीक्षा के स्थान की गुफा मौजूद है। दोनो संगठनों ने चेतावनी दी है कि सरकार के आदि गुरु शंकराचार्य की दीक्षाभूमि एवं जन्म तिथि से संबंधित अधिसूचना के खिलाफ प्रदेश भर में विरोध प्रदर्शन किए जाएंगे। सभा को आलोक मिश्रा, आशीष त्रिवेदी, अनीता कैथवास, केशव शुक्ला, माधुरी मिश्रा, छोटी कुशराम, आशीष तिवारी, सुशील तिवारी ने संबोधित किया।
स्वार्थपरक रवैया
प्रगतिशील ब्राह्मण महासभा के सहसंयोजक असीम त्रिवेदी ने कहा है कि सरकार आरक्षण से बचने के लिए संविदा पर नियुक्तियां कर रही है। उन्होंने इसे नीति आयोग की साजिश करार दिया है। प्रवक्ता पंकज तिवारी ने बताया कि इससे सरकार का स्वार्थपरक रवैया साफ नजर आ रहा है।