
जबलपुर. ओशो ऐसा नाम, जो दुनियाभर में अलग विचार और तर्क के लिए जाना जाता है। जिनके दर्शन की उत्पत्ति संस्कारधानी से हुुई और फिर उनके विचारों की क्रांति यूरोप तक पहुंची। आचार्य रजनीश जबलपुर आए तो थे प्रोफेसर के कॅरियर के लिए, लेकिन यहां से उन्होंने दर्शन का नया फलसफा बना दिया। उनके जमाने के पढ़ाए छात्र आज भी ओशो को रजनीश के तौर पर याद करते हैं। ओशो ऐसे आध्यात्मिक गुरु हुए, जिनके उपदेशों ने हमेशा विवादों को जन्म दिया। धार्मिक रूढि़वादिता के कठोर आलोचक ओशो ने यूरोप खासतौर सबसे ताकतवर देश अमेरिका में खलबली मचा दी थी। उनकी सीख और उपदेशों का अंदाजा अमेरिका में बसे रजनीशपुरम से ही लग जाता है। हालांकि, उन्होंने अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा जबलपुर में रहते हुए ही गुजारा था। जबलपुर के भंवरताल में ओशो को ज्ञान की प्राप्ति हुई। उनकी प्रारंभिक शिक्षा जबलपुर में हुई। दर्शनशास्त्र की पढ़ाई के लिए वे सागर गए। फिर कुछ दिनों तक रायपुर में नौकरी करने के बाद वे दोबारा जबलपुर लौट आए।
महाकोशल कॉलेज में रहे प्रोफेसर
जबलपुर में महाकौशल कॉलेज में उन्होंने दर्शनशास्त्र पढ़ाना शुरू किया। इस दौरान ही ओशो ने छात्रों का एक संगठन बनवाया और व्यवस्था के खिलाफ लोगों को आंदोलन करने की शिक्षा दी। जबलपुर के भंवरताल गार्डन में एक पेड़ के नीचे बैठे- बैठे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इसके बाद ओशो ने बकायदा प्रवचन देना शुरू कर दिया था।
एक लाख पुस्तकें पढ़ीं
आचार्य रजनीश ने अपने पूरे जीवन में एक लाख से भी ज्यादा पुस्तकें पढ़ी थीं। उन्होंने तो खुद आचार्य रजनीश के नाम से गीता तक लिखे थे। ओशो से जुड़े कई किस्से जबलपुर के लोगों को पता है। महाकौशल कॉलेज में ओशो ने अपनी सारी डिग्रियां जला दी थी। उनका विद्रोह धार्मिक अंधविश्वास, सामाजिक अंधविश्वास, राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ था। ओशो कुछ लिखते नहीं थे, लेकिन जो बोलते थे उसे ही पंजीबद्ध किया गया है। ओशो ने धर्म राजनीति समाज परिवार देश दुनिया दर्शन के बारे में भी प्रवचन दिए हैं। लोगों ने उनकी यादों को सहेजने का काम किया गया है. जबलपुर के देवताल आश्रम में आज भी ओशो की स्मृतियां देखने को मिल जाती है। जिन्हें देखने के लिए दुनिया भर से ओशो के अनुयायी आते है। हालांकि, जबलपुर शहर ने ओशो से जुड़ी विरासत को सहेज कर नहीं रखा।