जयपुर

बडिय़ारी वंशज के 14 गांव करेंगे मां भगवती कालिंका की पूजा

उत्तराखंड के गढ़वाल अल्मोड़ा में स्थित है महाकाली मंदिर, 2 दिसंबर से शुरू होगी जात्रा, मार्गशीर्ष महीने में हर तीसरे साल में बडिय़ारी वंशज के लोग करते हैं पूजा.... 25 शक्तिपीठों में से उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं अल्मोड़ा के दुशांत में स्थित महाकाली मंदिर गढ़वाल अल्मोड़ा में त्रैवार्षिक महाकाली की जात्रा 2 दिसंबर से शुरू होगी। इसके लिए बडिय़ारी कुल सहित कई गांवों की परिक्रमा करने के बाद 13 दिसंबर को शक्तिपीठ क्वाठा में भी
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Nov 07, 2019
14 villages of Badari descendants will worship mother Bhagwati Kalinka
Mahakali Temple is located in Garhwal Almora, Uttarakhand

नैनीतालl 25 शक्तिपीठों में से उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं अल्मोड़ा के दुशांत में स्थित महाकाली मंदिर गढ़वाल अल्मोड़ा में त्रैवार्षिक महाकाली की जात्रा 2 दिसंबर से शुरू होगी। इसके लिए बडिय़ारी कुल सहित कई गांवों की परिक्रमा करने के बाद 13 दिसंबर को शक्तिपीठ क्वाठा में भीतरी कौथीक होने के बाद 14 दिसंबर को भगवती न्याजा महाकाली मंदिर प्रांगण में लग्न अनुसार रहेगी।

महाकाली मंंदिर का पूर्वी भाग उत्तर भारत में उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के लखोरा सराईखेत स्थित मटखानी ग्राम सभा के अतंर्गत आता है और शक्तिपीठ महाकाली मंदिर का भीतरी भंडारा व मंदिर के तीनों भाग (पश्चिम उत्तर और दक्षिण) गढ़वाल बीरोखाल ब्लॉक के गेडीगाड क्षेत्र के ग्राम क्वाठा तल्ला में अंतर्गत आता है।
इसलिए करते हैं पूजा
महाकाली मंदिर ट्रस्ट के महासचिव विक्रम सिंह रावत ने बताया कि बडिय़ारी वंशज के लैली बूबा गोरखों से लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हो गए, इसीलिए बडिय़ारी वंशज उनकी शांति एवं मनोकामना के लिए मां भगवती कालिंका की पूजा-अर्चना करते हैं, जिसको जात्रा (जतोड़ा) भी कहा जाता है। यह जात्रा शीतकाल मार्गशीर्ष महीने के शुक्ल पक्ष में हर तीसरे साल में बडिय़ारी वंशजों के चौदह गावों के लोग व कुल पंडितों (जखोला के ममगाई) की ओर से विधि-विधान से पूजा की जाती है। यह पूजा मां भगवती कालिंका के अंदर भंडार ग्राम क्वाठा से पूर्ण विधि-विधान से पहले पूजा-अर्चना शुरू होती है।
क्षेत्र का यह है ऐतिहासिक विवरण
महाकाली मंदिर ट्रस्ट के महासचिव विक्रम सिंह रावत ने बताया कि ऐतिहासिक विवरण के अनुसार 17वीं शताब्दी के अंत में पूरे गढ़वाल-कुमाऊं पर अधिपत्य हो जाने के बाद गोरखों ने महाराज प्रधुम्न शाह को मार कर गढ़वाल-कुमाऊं को गुलाम बनाया। इसके बाद गोरखों ने गढ़वाल-कुमाऊं के जनमानस पर बहुत अत्याचार किया। गोरखों के इस अत्याचार से तंग आकर लोग घर छोड़कर जंगलों में छिप गए थे। इसी दौरान लैली बूबा (ललित सिंह बडियारी) भी घर-परिजनों से बिछुड़ कर जंगलों में भटकते-भटकते बच्चों को लेकर पाखापाणी पहुंच गए थे। वहां उन्होंने चट्टान खोदकर एक गुफा तैयार की, जोकि आज भी लैली उड्यार के नाम से विख्यात है। जब गोरखों के अत्याचार से तंग आकर लैली बूबा बच्चों को लेकर जंगलों में भटक रहे थे, तभी मां भगवती कालिंका ने उन्हें दिव्य दर्शन दिए और बोली कि मेरी छत्रछाया हमेशा तुम्हारे वंशजों पर बनी रहेगी। इसके लिए तुम्हें किसी ऊंचे स्थान पर मेरे मंदिर की स्थापना करनी होगी। इतना बोल कर मां कालिंका अन्तरध्यान हो गई। धीरे-धीरे जंगलों को काटकर लोग घर-परिवार बसाने लगे। लैली बूबा ने भी बंदरकोट में घर बसाया। कुछ दिनों बाद बूबा ने गढ़वाल-कुमाऊं के दुशान में कालिंका मंदिर की स्थापना की। फिर बूबा का परिवार बढ़ता गया तो आज मां भगवती कालिंका और बूबा के आशीर्वाद व छत्रछाया से लैली बडिय़ारी वंशज 14 गांव गैड़ीगाड़ और लखोरा क्षेत्र में विकसित हुए हैं। इनमें गैडीगाड गढ़वाल क्षेत्र में क्वाठा मल्ला, क्वाठा तल्ला, मवाण बाखली, मरखोला, बनंदरकोट मल्ला, बनंदरकोट तल्ला, थबडिया तल्ला और धोबीघाट हैं। वहीं लखोरा अल्मोड़ा क्षेत्र में मल्ला लखोरा, मल्ला लखोरा (कुणगाड), मटखानी, तनसालीसैण, बाखली और रानी ड्यारा हैं।

Updated on:
07 Nov 2019 10:18 pm
Published on:
07 Nov 2019 10:18 pm