कुछ सरकारी विभाग ऐसे मिलेंगे जिनमें अगर किसी एलडीसी को यूडीसी बना दिया जाए तो शायद वह मंजूर नहीं करे।
राजस्थान हाईकोर्ट ने जर्जर स्कूल भवनों की मरम्मत में देरी पर टिप्पणी की है कि 'राजनेता तबादलों में व्यस्त हैं और बच्चों पर ध्यान ही नहीं है। सरकारी स्तर पर तबादलों का दौर और इनमें राजनेताओं की रुचि नई बात नहीं। करीब पचपन साल पहले भी तबादलों को लेकर कुछ ऐसा ही माहौल था। राजस्थान में तत्कालीन सरकार ने तबादला प्रक्रिया में बदलाव किया तब भी श्रद्धेय कुलिश जी ने शासन को जो नसीहत दी वह आज भी प्रासंगिक है। आलेख के प्रमुख अंश: यों देखा जाए तो तबादले अपने आप में कोई चीज नहीं है। चूंकि अब यह एक बड़ी चीज बन गई है इसलिए यह सहज ही समझा जा सकता है कि सरकारी तंत्र कितनी गिरावट पर चला गया है। कुछ सालों से राजस्थान में यह माहौल बन गया था कि मंत्री और विधायकों का सबसे बड़ा काम तबादले करवाना ही रह गया था। तबादला अपने आप में इतना बड़ा कारोबार बन गया था कि विधायक व अन्य कार्यकर्ता इसमें बिचौलिए का काम संभाल बैठे थे। हालात ऐसे हो गए जिनसे लगता था कि राज्य की एक-एक कुर्सी बोली लगाकर ठेके पर उठा दी गई है। एक लाख नर-नारियों के प्रतिनिधि विधायक का सबसे बड़ा धंधा तबादले करवाना और ढाई करोड़ पर शासन करने वाले मंत्री का स्वार्थ और परमार्थ तबादले करना रह गया था। विभागों के अध्यक्ष अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे दस्तखत मारकर चौथ वसूली कर लेते थे। अगर किसी विभाग में किसी अफसर को मनचाही जगह के लिए तुरंत कुछ नहीं देना पड़ा तो चंदे के नाम पर बाद में वसूल हो जाता था। यह जलालत और गिरावट की हद थी जब शासक अपने मुलाजिम से रिश्वत मार ले। तबादलों में रिश्वतखोरी और चुनाव में चंदा वसूली के लिए जब अफसर लिप्त हो जाते हैं तो भ्रष्टाचार एक कानून या रिवाज का रूप धारण कर लेता है। तबादलों की रिश्वत और अफसरों की चंदाखोरी पर रोक लग जाए तो उसका असर नीचे तक पड़े बिना नहीं रहेगा। तबादलों के प्रसंग पर चर्चा करते समय एक और पहलू पर नजर डालना ठीक होगा। कुछ सरकारी विभाग ऐसे मिलेंगे जिनमें अगर किसी एलडीसी को यूडीसी बना दिया जाए तो शायद वह मंजूर नहीं करे। क्योंकि ऐसे एलडीसी के पास ऊपर की आमदनी के जो अवसर हैं वे यूडीसी के पास नहीं होते। जब तक उच्च स्तर पर सफाई नहीं होगी तब तक आम जनता को राहत नहीं मिलेगी। प्रशासन तंत्र से यह अपेक्षा की जाएगी कि काम करके दिखाएं। प्रशासन की जो साख जनता में समाप्त हो गई है उसे फिर जमाना है। रोजमर्रा के कामों में आम जनता को चुस्ती और फुर्ती नजर आनी चाहिए और सरकार की नीतियों पर अमल होना चाहिए।
(५ जुलाई १९७२ को प्रकाशित 'तबादलों की दुकानदारी ठप्प, दलाली ठप्प' आलेख के अंश)
लोकशाही और नौकरशाही की मिली भगत
यह देखकर दर्द होता है और शर्म भी आती है कि जिन लोगों को नीतियां बनाने व इन्हें अमल में लाने के लिए चुना जाता है, उनका पूरा नहीं तो ज्यादातर समय तबादले करने या रुकवाने में जाता है और शेष समय तथाकथित जनसम्पर्क में। तहसील से लेकर सचिवालय तक कामकाजी आदमी फैसलों के इंतजार में चक्कर लगाते रहते हैं लेकिन फाइल एक मेज से दूसरी मेज पर पहुंचने का नाम ही नहीं लेती। जिस पर भी दफ्तर वालों की सारी प्रतिभा इस बात में खर्च हो जाती है कि काम में किस तरह से फच्चर फंसाया जा सकता है। प्रशासनिक सुधार आयोग में बड़े-बड़े धुरंधर बैठे हुए हैं और बरसों से रिपोर्ट पेश करते रहे हैं। लेकिन देश का यह साम्राज्यशाही प्रशासन टस से मस नहीं होना चाहता। वह भ्रष्ट भी है और निकम्मा भी। अनुभवी लोगों का तो यहां तक मानना है कि प्रशासन की कारगुजारी में गिरावट आई है और यह गिरावट ऊपर से आई है। यह लोकशाही और नौकरशाही की मिलीभगत समझी जाती है। जन-जन की रोजमर्रा की इस जिंदगी से इस ढांचे को, इस ढर्रे को कोई सरोकार नहीं है। जिसने गरीबी हटाने के नाम पर छप्पर फाड़ वोट दिया है वह अब देखना चाहता है और तुरंत देखना चाहता है कि शासन तंत्र का आडम्बर दूर होता है या नहीं। लालफीताशाही दूर होती है या नहीं। भ्रष्टाचार दूर होता है या नहीं। जनसाधारण की यह अकिंचन-सी मांग है। इससे ज्यादा मिल जाए तो कहना ही क्या?
(कुलिश जी के अग्रलेखों पर आधारित पुस्तक 'हस्ताक्षर' से )
सत्ता की जाति
दो पदार्थ संसार में,
इक सत्ता इक भाति।
उठा आँगली जाँणल्यो,
या सत्ता की जाति।।
('सात सैंकड़ा' से)
सर..सर..सर..अफसर कहे,
नेता बोले 'सा ब'।
सर साहब की ताकड़ी,
तुलै माल-असबाब।।
('पोलमपोल' से)