असहाय लोगों और बुजुर्गों को इलाज के लिए जाना पड़ रहा दूर डिस्पेंसरी बने तो सैकड़ों जरुरतमंदों और विद्यार्थियों को होगा फायदा
जयपुर। आगरा रोड, जामडोली स्थित सामाजिक न्याय संकुल में रह रहे असहाय बुजुर्गों, भिक्षुकों और एकल नारियों के लिए चिकित्सा सुविधा एक बड़ी चुनौती बन गई है। सैकड़ों जरूरतमंदों की आबादी वाले इस संकुल में बसावट के दस साल बाद भी सरकारी डिस्पेंसरी नहीं बन पाई है, जबकि इसके लिए सालों पहले ही योजना तैयार कर भूमि तक चिन्हित की जा चुकी है। लेकिन सरकारी डिस्पेंसरी अब तक कागजों से निकलकर अमलीजामा नहीं पहन पाई।
दरअसल, इस परिसर में वर्तमान में तीन मुख्यमंत्री पुनर्वास गृह, असहाय लोगों के लिए दो ‘अपना घर’ आश्रम संचालित हैं। इसके अलावा यहां पांच हॉस्टल, दिव्यांगों संबंधी दो कॉलेज और केंद्र सरकार का क्षेत्रीय कौशल विकास पुनर्वास एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण केंद्र (सीआरसी) भी संचालित है। ऐसे में यदि डिस्पेंसरी बनती है तो छात्रावासों में रहने वाले विद्यार्थियों को भी मौके पर ही चिकित्सा सुविधा मुहैया हो सकती है।
इलाज के लिए 3 से 5 किमी दूर जाना मजबूरी
संकुल में रहने वाले बुजुर्गों और असहाय महिलाओं को शुगर, रक्तचाप, मौसमी और छोटी-मोटी बीमारियों के इलाज के लिए 3 से 5 किलोमीटर दूर स्थित सरकारी डिस्पेंसरियों तक जाना पड़ता है। हालात यह हैं कि अधिकतर बुजुर्ग चलने-फिरने में असमर्थ हैं। पुनर्वास गृहों के पास हर समय वाहन उपलब्ध नहीं होने से निजी साधनों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे आर्थिक बोझ बढ़ने के साथ-साथ समय भी खराब होता है।
वाहन न मिलने की समस्या
परिसर में स्थित एक गृह के स्टाफ ने बताया कि यहां अधिकतर आवासीय बुजुर्गों को किसी न किसी बीमारी की नियमित दवाएं देनी पड़ती हैं। इसके लिए आए दिन इनको कई किमी. दूर स्थित डिस्पेंसरी ले जाना पड़ता है। उन्होंने बताया कि समस्या यह है कि यहां सरलता से वाहन नहीं मिलते, कई बार तो रिक्शे या टैक्सी के लिए काफी देर इंतेजार करना पड़ता है। ऐसे में यदि परिसर में ही सरकारी डिस्पेंसरी बन जाए, तो असहाय बुजुर्गों, महिलाओं और विद्यार्थियों को नियमित इलाज की बड़ी राहत मिल सकती है।
इनका कहना है…
डिस्पेंसरी के लिए स्थान तो चिन्हित है। यह समस्या अधिकारियों को अवगत कराउंगा, ताकि डिस्पेंसरी जल्द शुरू हो सके।
मनोज शर्मा, निदेशक
सेंटर फॉर एक्सीलेंस