मीठे जल का पता लगाने वाले उपकरण कबाड़
जयपुर. तेजी से जमीन में जा रहा भूजल अशुद्ध होता जा रहा है, वहीं इस अशुद्धि का पता लगाकर मीठे पानी के स्रोत तैयार करने वाले करोड़ों के उपकरण भी सारसंभाल के अभाव में कबाड़ बन गए हैं। पेयजल किल्लत से जहां एक तरफ आमजन परेशान है, वहीं ये मशीनें 20 साल से राजधानी में पानीपेच स्थित जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग के ड्रिलिंग खंड में कभी काम आने का ही इंतेजार कर रही हैं। ये मशीनें यूनीसेफ से भारत सरकार के माध्यम से विभाग को अनुदान में मिली थी। विभाग की ओर से नलकूप खुदवाने का काम निजी एजेंसियों से कार्य गया जिसके चलते आज ये ये हालात सामने आए हैं।
लोगर, जो बता देते हैं कहां खोदें नलकूप
विभाग में जंग खा रही यह मशीन दरअसल लोगर है, जो उस स्थान को बता देती है, जहां नलकूप खुदवाया जाना उपयुक्त है। ये मशीन जमीन के अंदर खारे पानी के स्रोत का पता लगाती हैं। उस स्रोत को सील कर मीठे पानी के स्रोत से जोड़ दिया जाता है, जिससे नलकूप मीठा पानी ही उगलता है।
मशीन भी कंडम
नलकूप, हैंडपंप बनाने के काम आने वाली ३५-४० ड्रिलिंग रिग मशीनें भी मेंटीनेंस नहीं होने के कारण से खराब हो चुकी हैं। ड्रिलिंग क्षेत्र और खंडों में मैकेनिकल इंजीनियर नहीं लगाए गए हैं।
राज्य वाहन चालक एवं तकनीकी कर्मचारी संगठन के प्रदेशाध्यक्ष महेश शर्मा ने बताया की लोगर 20 साल से ड्रिलिंग खंड परिसर में पड़े हैं। प्रदेश में भूजल दोहन को देखते हुए इन्हें काम में लेना जरूरी है।
ऑपरेट कौन करे, विशेषज्ञ ही नहीं
लोगर को ऑपरेट करने के लिए भू-भौतिकविद् की सहायता ली जाती है। विभाग में इसका पद ही नहीं है। वैज्ञानिक तरीके से नलकूप खुदाई के लिए हाईड्रोलॉजिस्ट की जरूरत रहती है, पहले ही विभाग में एकमात्र हाईड्रोलॉजिस्ट था जिसको भी किसी अन्य विभाग में भेज दिया गया है।