कार्टूनिस्ट शब्दों की लंबी-चौड़ी व्याख्या के बिना ही पाठकों तक संदेश पहुंचा देता है। यही वजह थी कि पाठक सबसे पहले अखबार खोलते ही कार्टून पर नजर डालते थे।
अभिषेक तिवारी,(सीनियर एडिटोरियल कार्टूनिस्ट)- विश्व कार्टूनिस्ट दिवस के अवसर पर यह सवाल स्वाभाविक रूप से मन में उठता है कि भारत में आज अखबारों से कार्टून क्यों गायब होते जा रहे हैं? कभी हर बड़े अखबार की पहचान उसका संपादकीय कार्टून हुआ करता था, जो सामाजिक-राजनीतिक मुद्दे पर तीखी, सारगर्भित और व्यंग्यपूर्ण टिप्पणी होता था। लेकिन आज वही कार्टून अखबारों के पृष्ठों से लुप्तप्राय हो गए हैं। यह बदलाव केवल एक कला के हाशिये पर जाने का संकेत मात्र नहीं, बल्कि पत्रकारिता की बदलती प्राथमिकताओं का भी द्योतक है।
दो दशक पहले तक लगभग हर प्रमुख अखबार में एक समर्पित स्टाफ कार्टूनिस्ट होता था। यहां हम संतोष के साथ कह सकते हैं कि पत्रिका समूह के न्यूज रूम में आज भी एडिटोरियल कार्टूनिस्ट (एक नहीं बल्कि दो) पूरी सक्रियता से मौजूद हैं। जबकि अधिकांश हिंदी-अंग्रेजी अखबार अब कार्टून विहीन हो चुके हैं। हालांकि मराठी, मलयालम और बंगाली भाषा के अखबारों में स्थिति थोड़ी अलग है। कार्टूनिस्ट शब्दों की लंबी-चौड़ी व्याख्या के बिना ही पाठकों तक संदेश पहुंचा देता है। यही वजह थी कि पाठक सबसे पहले अखबार खोलते ही कार्टून पर नजर डालते थे।
भारतीय पत्रकारिता में कार्टून की परंपरा अत्यंत समृद्ध रही है। शंकर पिल्लई, आर.के. लक्ष्मण, अबू अब्राहम, काक, सुधीर दर, सुधीर तैलंग जैसे दिग्गज एडिटोरियल कार्टूनिस्टों ने अपने व्यंग्य के माध्यम से सत्ता, समाज और व्यवस्था पर करारी चोट की। उनके बनाए पात्र और रेखाचित्र आज भी लोगों की स्मृति में जीवित हैं। उनके कार्टून लोकतंत्र में स्वस्थ आलोचना के प्रतीक थे। फिर ऐसा क्या हुआ कि यह सशक्त विधा धीरे-धीरे हाशिये पर चली गई? पड़ताल करने पर इसके पीछे कई कारण नजर आते हैं। सबसे प्रमुख कारण है मीडिया का तेजी से बदलता स्वरूप। सोशल-डिजिटल मीडिया और 24 घंटे न्यूज के दौर में तात्कालिकता और गति को अधिक महत्व दिया जाने लगा है। खबरें अब सेकंडों में अपडेट होती हैं और इस तेज रफ्तार समय में गहन व्यंग्य और विचार की जगह कम होती जा रही है। दूसरा महत्वपूर्ण कारण है व्यावसायिक दबाव। 1990 के बाद हिंदी पत्रकारिता का बड़ा विस्तार हुआ। उपभोक्ता अनुकूल कंटेंट बढ़ा। विज्ञापनों और पाठक संख्या की होड़ में कंटेंट की प्राथमिकताएं बदल गईं। ऐसे में कार्टून, जिससे तुरंत 'मापने योग्य लाभ' नहीं मिलता, धीरे-धीरे कम जगह पाने लगा। कार्टून की जगह इन्फोग्राफिक ने ली। व्यंग्य की जगह सनसनी ने ले ली। विचार की जगह विजुअल पैकेजिंग ने ली। चूंकि संपादकीय कार्टून सोच मांगता है। राजनीतिक कार्टून कभी-कभी जोखिम भी लाता है। कार्टून सत्ता के दंभ को तोडऩे का सबसे प्रभावी माध्यम भी है। इसलिए सबसे पहले वही निशाने पर भी आता है।
हालांकि, यह कहना गलत होगा कि कार्टून की प्रासंगिकता समाप्त हो गई है। आज भी जब कोई प्रभावशाली कार्टून सामने आता है, तो वह व्यापक चर्चा का विषय बनता है। यह विधा आज भी उतनी ही ताकतवर है, जितनी पहले थी। बस उसे मंच और प्रोत्साहन की आवश्यकता है। यह प्रयास व्यापक स्तर पर होने चाहिए। आवश्यक है कि मीडिया संस्थान इस कला के महत्व को समझें और इसे पुन: प्रमुखता दें। साथ ही, नए कार्टूनिस्टों को अवसर और मंच प्रदान किए जाएं, ताकि यह परंपरा आगे बढ़ सके। देश में पत्रकारिता संस्थानों की भरमार है। मगर अफसोस उनके यहां भी कार्टून कला का कोई विभाग नहीं होता। अखबारों से कार्टूनिस्टों का गायब होना केवल एक पेशे का संकट नहीं, बल्कि रचनात्मक अभिव्यक्ति और आलोचनात्मक सोच के क्षरण का संकेत है। हिंदी के कवि चंद्रकांत देवताले कहा करते थे- 'कार्टून और फोटो किसी भी अखबार के सुहाग चिह्न होते हैं।'