लोग पीतल की टंकियों में भरे टिपोरे, लड्डू आदि व्यंजनों को बैल गाडिय़ों से ले जाते...
- जितेन्द्र सिंह शेखावत
जयपुर। जयपुर बसने पर आमेर से आए हलवाइयों ने स्वादिष्ट व्यंजनों के स्वाद को बुलंदियों पर पहुंचा दिया। यहां की जलवायु में कचौरी, बरफी और कळाकंद के स्वाद का मिजाज और भी अच्छा हो जाता है। कवि आत्माराम ने लिखा कि जोधपुर महाराजा जसवंत सिंह सन 1708 में आमेर आए तब भोज में परोसे मिश्री मावा, खस्ता कचौरी और मावे की गूंजी उनको बहुत पसंद आई।
सवाई माधोसिंह द्वितीय के शासन में मिश्रराजाजी का रास्ता में चौथे चौराहे पर कळजुग्या हलवाई की कचौरी और हरी मिर्च के टिपोरों के स्वाद ने लोगों को कायल कर दिया था। सेठ रामप्रताप झालानी और नारायणजी रावत ने करीब सवा सौ साल पहले मिलकर यह दुकान खोली। वे हरी मिर्ची के तळे टिपोरों के अलावा करारी कचौरी और थाळ की बरफी बनाने लगे। बरसों पहले तक कळजुग्या हलवाई एक आने में हरे पत्ते का दोना भरकर टिपोरे देता। राम प्रताप झालानी सांगानेरी गेट सब्जी मंडी से रोजाना सुबह ताजा हरी मिर्च लाते। टिपोरों के लिए मसाले भी वे खुद ही हाथ से कूट छान कर तैयार करते। तेलीपाड़ा की घाणी के तिल्ली तेल से टिपोरे बनाते।
ऐसे पड़ा कळजुग्या नाम
कळजुग्या के वंशज हनुमान प्रसाद झालानी के मुताबिक मिठाइयों के लिए चीनी की बोरियां पल्लेदार हाथ गाड़ी में डालकर लाते थे। एक बार किराये को लेकर पल्लेदारों से विवाद हो गया तब उन्होंने खुद के स्तर पर सामान मंगाना शुरू कर दिया। इससे नाराज हो पल्लेदार कहने लगे कि देखो कैसा कळजुग आ गया, हमारे काम को भी सेठजी खुद करने लगे हैं। इसके बाद सेठ राम प्रताप का नाम शहर में कळजुग्या हलवाई के नाम से मशहूर हो गया। जीमणारों में सामान कम पडऩे पर लोग पीतल की टंकियों में भरे टिपोरे, लड्डू आदि व्यंजनों को बैल गाडिय़ों से ले जाते। कळजुग्या का बनाया कैरी का अचार भी बहुत प्रसिद्ध रहा।