
अब फेफड़ों में साउंड वेव भेजकर भी अंदरूनी संरचना में आए बदलाव के बारे में पता किया जा सकता है। इसके लिए ऑसिलोमेट्री तकनीक आ गई है जो फेफड़ों की सटीक जांच में मददगार है। आरयूएचएस व एसएमएस मेडिकल कॉलेज के तत्वावधान में यूनाइटेड एकेडमी ऑफ पल्मोनरी मेडिसिन, इंडिया की ओर से राजधानी में आयोजित नेशनल कॉन्फ्रेंस इकाइकॉन-2023 में शुक्रवार को विशेषज्ञों ने डायग्नोसिस और इलाज के बारे में यह जानकारी दी। आयोजन सचिव डॉ. एमके गुप्ता ने बताया कि उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि आरयूएचएस के कुलपति डॉ. सुधीर भंडारी थे।
ऑर्गनाइजिंग प्रेसिडेंट डॉ. विनोद जोशी और ऑर्गनाइजिंग चेयरमैन डॉ. महेंद्र बैराना ने बताया कि डॉ. डी. बेहरा, डॉ. एबी सिंह व डॉ. डीएन शिवपुरी ने ओरेशन दिया। यूएसए से आए डॉ. पीके वेदांथन ने फूड एलर्जी में आए बदलाव के बारे में जानकारी दी। डॉ. संदीप निझावन ने नॉन सिलियक ग्लूटेन संवेदनशीलता और इसके क्लिनिकल असर के बारे में अपनी रिसर्च रखी।
ऑसिलोमेट्री तकनीक बच्चों के इलाज में खासी मददगार - डॉ. साइबल मोइत्रा
डॉ. साइबल मोइत्रा ने बताया कि ऑसिलोमेट्री तकनीक बच्चों के इलाज में खासी मददगार है।नागपुर की डॉ. रूपाली पाटिल जैन ने बताया कि भारत में तीन साल की उम्र से कम के 6 से 8 प्रतिशत और 8 से ज्यादा उम्र के 4 प्रतिशत बच्चों को फूड एलर्जी की समस्या है। अगर माता पिता में से किसी एक को एलर्जी की शिकायत है तो बच्चे में एलर्जी होनी की संभावना 40 प्रतिशत और दोनों को है तो यह संभावना 60 प्रतिशत तक बढ़ जाती है।
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