
जयपुर से अमित शर्मा की रिपोर्ट
चौमूं से चार किलोमीटर पहले चाय की थड़ी। ढलते सूरज के साथ थकावटदूर करते बेलदार व किसान। स्मार्टफोन पर बार-बार नजरें गड़ाए सत्यनारायण। झांका तो दिखा, लूडो खेल रहे हैं। वो भी ऑनलाइन, दो दोस्तों के साथ। वे हर महीने 399 का रीचार्ज कराते हैं और 4 जी के पूरे मजे ले रहे हैं। लूडो टाइम पास के लिए खेलते हैं औरसब्जियों के भाव पर नजर रखते हैं। सत्यनारायण खेतों में सब्जी बोते हैं। जयपुर आने वाली सब्जी की आवक में बड़ा हिस्सा चौमूं के किसानों का है।
डिजिटल इंडिया के प्रयासों में वो केन्द्र सरकार से खुश हैं, लेकिन राज्य सरकार से खासे खफा नजर आये। उनका कहना है कि बार-बार आंदोलन के बाद भी सरकार ने नहीं सुनी। ऋण सिर्फ सहकारी बैंकों से लोन लेने वाले किसानों का ही क्यों माफ हुआ, ये सवाल वो सरकार से पूछना चाहते हैं पर पूछते नहीं हैं, क्योंकि कोई सुनेगा ही नहीं, ये वो जनाते हैं। बगल में बैठे नानकराम सैनी को डिजिटल इंडिया में कोई खास दिलचस्पी नहीं लगी। उन्हें लगता है कि काम करते आदमी को सस्ते इंटरनेट ने नकारा बना दिया है।
नानकराम बेलदार थे, एक्सीडेंट के बाद से काम नहीं कर सकते। बजरी के भावों के कारण राज्य सरकार और केन्द्र दोनों से नाराज हैं। किसान कुंभाराम थोड़े पढ़े लिखे नजर आये, अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा, 'चार साल किसानों के लिए लॉप रहे। समर्थन मूल्य घोषित हो गया, पर खरीद कब करेगी सरकार? सब्जी पर कोई पॉलिसी ही नहीं है सरकार की। उगाते हम हैं, कमाते दलाल हैं, दाम न मिलने पर सड़क सब्जी फेंक घाटा हम उठाते हैं।'
खेतीहर किसान सुरज्ञान का कहना है कि राम और राज दोनों ने राहत न दी। हमारे बच्चे अब खेती नहीं करना चाहते, नौकरियां मिल नहीं रहीं। जैतरा गांव के गोपाल बेलदारी करते हैं। सरपंच से लेकर विधायक तक पर बरस पड़े। बोले, 'कानून बने हुए हैं, पर पालन तो कराओ। सब टरकाने में लगे हैं। कोई फैसला नहीं होता, वोट के टाइम आते हैं बस नेता लोग, सरकार गरीब के नहीं, गधे के साथ है (गुस्से में)। अगर अफसर हमारी नहीं सुनते तो वो गधे के बराबर ही है हमारे लिए।'
जगदीश का कहना है, 'हमें दूध का 18 से 22 का दाम मिलता है। बाजार में खरीदने जाएं तो 35-44 रुपए में मिलेगा। हम बर्बाद हो रहे हैं, डेयरी में बैठे दलाल मालामाल हो रहे हैं। जो भी सरकार आए, कुछ करे।'
डिजिटली अप टू डेट किसान को देख लगा, इंटरनेट क्रांति शहरों तक ही नहीं, खेत खलियानों तक पहुंच रही है, पर किसानों की नई पीढ़ी खेती करना नहीं चाहती, नौकरी मिल नहीं रही, तो फिर वो जाएंगे कहां? , ये सोचते हुए हम बढ़ चले, अगले गांव की ओर, क्योंकि चाय भी पूरी हो चुकी थी और चर्चा भी।