जानिए होली मनाने के पीछे छिपी अन्य मान्यताएं
भारत जैसे विविधता से परिपूर्ण देश में हर त्यौहार को बड़े धूमधाम और उल्लास से मनाया जाता है, फिर रंगों के त्यौहार से भला कोई कैसे बच सकता है। अब भिन्नता से भरे इस देश में रंगों के त्यौहार को लेकर भी विविध मान्यताएं होना लाजमी है। आइए आज हम आपको बताते हैं होली से जुड़ी कुछ ऐसी मानयताएं जो आपने शायद नहीं सुनी होंगी।
सबसे प्रसिद्ध मान्यता भक्त प्रह्लाद से जुड़ी
रंगों के त्यौहार से यूं तो कई मान्यताएं जुड़ी हैं, लेकिन इन सबमें सबसे प्रचलित और प्रसिद्ध कहानी है प्रह्लाद की। पौराणिक काल के अनुसार हिरण्यकश्यप नाम का एक अति बलशाली असुर हुआ करता था। इसी बल के अभिमान में वो खुद को भगवान मानने लगा और अपने राज्य में उसके अलावा किसी और भगवान की पूजा अर्चना पर पाबंदी लगा दी। इस हिरण्यकश्यप का बेटा था प्रह्लाद, जो ईश्वर का परम भक्त था। हिरण्यकश्यप अपने बल के अभिमान में इतना अंधा हो गया कि उसे पुत्र मोह भी ना दिखाई दिया। बेटे के भगवान पर लगे ध्यान को हटाने के लिए इस अभिमानी ने उसे कई कठोर दंड दिए, लेकिन वो अपने मार्ग से नहीं डिगा। क्रोध में जल रहे हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को सबक सिखाने के लिए अपनी बहन होलिका की मदद ली, जिसे आग में भस्म नहीं होने का वरदान प्राप्त था। असुर राजा ने होलिका को आदेश दिया कि वो प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठ जाए। बल के मद में चूर असुर को लगा कि वो अपने बेटे को सबक सिखा देगा। लोगों में भी काफी कौतूहल था, लेकिन इस आदेश की क्रियान्विति के बाद जो हुआ उसने सभी को हैरान कर दिया। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया। इसी के बाद से ईश्वर भक्त प्रह्लाद की याद में होली जलाने की मान्यता चल पड़ी। ये भी माना जाता है कि प्रह्लाद का मतलब आनन्द होता है। होलिका के जलने से आनंद और प्रेम का प्रतीक प्रह्लाद चिर रहता है।
अन्य मान्यताएं
प्रह्लाद की कहानी के अलावा भी होली का ये मस्ती से भरा पर्व दूसरी कई मान्यताओं से जुड़ा हैै। ये पर्व राक्षसी ढुंढी, राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जुड़ा हुआ है। कुछ लोग ये भी मानते हैं कि होली के दिन शिव के गण रंग लगाते हैं। इसलिए कुछ लोग इस दिन शिव गणों का वेश धारण कर रंग लगाते हैं, नाचते हैं और शिव की बारात का दृश्य भी साकार करते हैं। कुछ लोगों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन राक्षसी पूतना का संहार किया था, जिसके बाद खुशी में ग्वालों और गोपियों ने रासलीला रची थी। साथ ही रंग भी खेला था।