
सरकारी अस्पतालों के दवा काउंटरों से मरीजों को दवाइयां नि:शुल्क भले ही दी जाती हों, लेकिन राज्य सरकार इन दवाओं की खरीद के साथ मरीज तक इसे पहुंचाने की आपूर्ति चेन पर भारी खर्चा करती है। इसके अतिरिक्त सालाना करीब एक हजार करोड़ रुपए इन दवाओं की खरीद पर खर्च हो रहे हैं। इसके बावजूद कई मरीज और कार्मिक इसका मोल नहीं समझ पा रहे। कई मरीजों को एक सप्ताह, 15 दिन, एक महीने या दो महीने तक दवा भी दी जाती है। इनमें से कुछ दवा का मरीज उपयोग नहीं कर पाता है और घर पर ही पड़ी रहती हैं। ऐसे में इन दवा को वापस काउंटर तक मंगवाने का मजबूत सिस्टम अब तक नहीं बन पाया है। वहीं, मरीज और उनके परिजन भी इन दवा को लौटाने का प्रयास नहीं करते।
जानकारी के मुताबिक दवा योजना की शुरूआत के साथ ही दवा लौटाने के लिए सरकारी अस्पतालों में ड्रॉप बॉक्स लगाने की व्यवस्थाएं की गई थीं। अब ये बॉक्स अस्पताल में कहां हैं, किसी को पता नहीं है।
रेशनल यूज को लेकर प्रयास ही हुए
नि:शुल्क दवा में ऐसी कई दवाइयां भी शामिल हैं, जो निजी बाजार में कई गुना अधिक दामों में बिकती हैं। सरकार ने मरीजों की इसी आर्थिक लूट को रोकने के लिए नि:शुल्क दवा योजना शुरू की थी। इसके साथ ही इनके रेशनल यूज (तार्किग उपयोग) को लेकर भी दिशा निर्देश दिए थे, लेकिन अधिकांश अस्पताल इसे सही तरीके से फॉलो नहीं कर रहे।
यह तत्काल हो सकता है
- प्रदेश के सभी सरकारी अस्पतालों में दवा योजना संचालित है। दवा वितरण के लिए सभी अस्पतालों में काउंटर भी बने हुए हैं। काउंटरों के बाहर ड्रॉप बॉक्स लगा दिए जाएं तो मरीज को स्वत: ही इन्हें लौटाने का संदेश मिल सकता है।
- निचले स्तर के अस्पताल में दवाइयां वापस आने पर उस अस्पताल के प्रभारी की जिम्मेदारी तय की जाए कि वह उन्हें मेडिकल कॉलेज अस्पताल, जिला अस्पताल या संबंधित अस्पताल तक पहुंचाने की व्यवस्था करे।
- काउंटर पर दवा लेने वाले मरीज या परिजन को दवा का उपयोग नहीं होने पर वापस करने की व्यवस्था की जाए। इस संबंध में मरीज और परिजन दोनों को जागरूक करने की आवश्यकता है।