जयपुरी रजाइयों का सालाना घरेलू कारोबार 300 से 400 करोड़ रुपए के बीच है, जिससे हजारों लोगों को रोजगार मिलता है।
जयपुरी रजाइयां देश-विदेश में अपनी विशेषता और गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध हैं। इन रजाइयों का सालाना घरेलू कारोबार 300 से 400 करोड़ रुपए के बीच है, जिससे हजारों लोगों को रोजगार मिलता है। हालांकि इस क्षेत्र में व्यापार को और अधिक बढ़ावा देने के लिए क्वालिटी कंट्रोल के नियम बनाए जाने और जीएसटी में रियायत मिलने की आवश्यकता है।
जयपुरी रजाइयों का निर्माण मुय रूप से राजधानी के बासबदनपुरा, गंगापोल, घाटगेट, आमेर, जयसिंहपुरा खोर और दिल्ली रोड जैसे क्षेत्रों में हो रहा है। यहां छोटे-छोटे कारखानों में रूई की पिंदाई और भराई का काम किया जाता है। कई परिवार इस व्यवसाय से जुड़े हुए हैं।
जयपुरी रजाई का काम करीब 80 साल पुराना है। इसे तैयार करने में रूई की 4-5 बार पिंदाई की जाती है। महंगाई के बावजूद इस काम में मजदूरी पूरी नहीं मिल पाती है। सरकार को इसे लघु उद्योग का दर्जा देना चाहिए और कारीगरों को लोन जैसी सुविधाएं प्रदान करनी चाहिए। -सलीम राठौड़, अध्यक्ष, जयपुर रजाई मजदूर यूनियन
जयपुरी रजाइयों की बिक्री जयपुर के प्रमुख बाजारों में जैसे चौड़ा रास्ता, हवामहल बाजार, बापू बाजार, नेहरू बाजार और सांगानेर में खूब हो रही है। इसके साथ ही इन रजाइयों का निर्यात सीतापुरा से भी किया जा रहा है। बाजार में सिंगल बेड रजाइयों की कीमत 500 रुपए से लेकर 2000 रुपए तक है। डबल बेड रजाइयों की कीमत 1000 रुपए से 2000 रुपए तक होती है।
जयपुरी रजाइयों का सालाना कारोबार 300 से 400 करोड़ रुपए का है। सरकार को इन रजाइयों की क्वालिटी कंट्रोल को लेकर नियम बनाने चाहिए और जीएसटी में छूट देनी चाहिए। इससे इस उद्योग में जुड़े लोगों को राहत मिलेगी और कारोबार को और गति मिलेगी। -विवेक भारद्वाज, उपाध्यक्ष, जयपुर रजाई व्यापार महासंघ के उपाध्यक्ष