gagron fort parrot: कभी झालावाड़ की पहचान रहे गागरोनी तोते अब यहां दिखाई नहीं देते हैं। करीब एक दशक से एलेक्जेंडर पैराकिट (गागरोनी तोता) (Alexander's Parakeet -Gagroni parrot) ने यह जगह छोड़ दी और अब अन्य जगह प्रवास कर लिया है। ऐसे में झालावाड़ का गागरोन किला (Gagron fort) इन तोतों से वीरान हो गया है। यह तोते इंसानी आवाज की बखूबी नकल करने के लिए भी मशहूर है।
झालावाड़ /पत्रिका न्यूज नेटवर्क. झालावाड़ की पहचान गागरोनी तोतों को फिर से यहां बसाने के लिए अब वन विभाग प्रयास में जुट गया है। इसके लिए वन मंडल कार्यालय से इसके पुनर्वास के लिए प्रस्ताव बनाकर भेजे गए हैं। इसपर कार्य शुरू होता है तो एक बार फिर झालावाड़ जिला और गागरोन का किला इन अद्भुत तोतों की चहचहाट से गुलजार हो सकेगा।
वन विभाग की ओर से एलेक्जेंडर पैराकिट को फिर से बसाने के लिए प्रस्ताव भेजा गया है। इसमें शुरुआती स्तर पर एक ब्रीडिंग सेंटर शुरू करने की बात कही गई है। इसमें इनकी ब्रीडिंग कराई जाएगी। संख्या बढ़ने के बाद इन्हें खुले में छोड़ा जाएगा। इसके साथ ही इनके अनुकूल वातावरण को तैयार किया जाएगा। साथ ही इनके शिकार और तस्करी पर रोक लगाने के लिए कार्य किया जाएगा।
प्राकृतिक आवास और भोजन हुआ नष्ट:
गागरोन में यह तोते पहले बड़ी संख्या में पाए जाते थे। धीरे-धीरे पेड़ों की कटाई और भोजन नष्ट होने से यह यहां से पलायन कर गए। इसके साथ ही मनुष्य की बोली की नकल करने के लिए इन्हें पकड़कर बेचने के कारण भी इनकी प्रजाति पर संकट आ गया।
भालता और नीमथूर में होती है साइटिंग:
कई वर्ष पूर्व एलेक्जेंडर पैराकिट (गागरोनी तोता) झालावाड़ में हजारों की संख्या में पाए जाते थे। 35-40 वर्ष पूर्व भी इन्हें अच्छी संख्या में गागरोन के आसपास देखा जाता था। अब यह झालावाड़ शहर के आसपास से बिल्कुल विलुप्त हो चुके हैं। अच्छी बात यह है कि अभी झालावाड़ जिले के भालता क्षेत्र में इनकी साइटिंग होती है एवं छतरपुर के पास मध्यप्रदेश की सीमा में लगा गांव नीमथूर के जंगलों में भी इन्हें देखा जा सकता है। सवाई माधोपुर में अभी यह अच्छी संख्या में मिल जाते हैं।
इनका कहना है:
एलेक्जेंडर पैराकिट पहले यहां अच्छी संख्या में थे। इन्हें फिर से यहां बसाने के लिए प्रस्ताव भेजे गए हैं। स्वीकृति मिलते ही इसका काम शुरू किया जाएगा।
—वी चेतन कुमार, उप वन संरक्षक, झालावाड़
एलेक्जेंडर पैराकिट यानि गागरोनी तोता झालावाड़ की पहचान है। इन्हें यहां फिर से बसाने के लिए वन विभाग को प्रयास करने चाहिए। इनके आवास और भोजन के प्राकृतिक स्रोत तैयार होने चाहिए। जिससे वह यहां फिर से रह सकें। भालता व मध्यप्रदेश के नीमथूर के जंगलों में इन्हें अभी भी देखा जाता है।
—मनोज कुमार शर्मा, पक्षीविद्, झालावाड़