
हिण्डौनसिटी.
संचार क्रांति ने समाज की जीवनशैली और मित्रता की परंपराओं को गहराई से प्रभावित किया है। पहले गांव और शहरों में लोग शाम को भोजन के बाद गली-मोहल्लों के नुक्कड़ पर बने चबूतरों पर बैठकर गपशप करते थे। वहां आमने-सामने बैठकर समाज, राजनीति और रोजमर्रा की घटनाओं पर चर्चा होती थी। कभी आवाज ऊंची होती, कभी नरम पड़ जाती, लेकिन रात को घर लौटते समय सारी कड़वाहट वहीं छूट जाती और मित्रता की मिठास कायम रहती।
पिछले तीन दशकों में यह परंपरा धीरे-धीरे खत्म हो गई। बेसिक टेलीफोन की जगह मोबाइल फोन ने ले ली और मोबाइल से आगे बढकऱ सोशल मीडिया ने इंसान को आभासी दुनिया में समेट दिया। अब गली-मोहल्लों की चौपालें सूनी हो गई हैं और चर्चाएं सोशल मीडिया ग्रुपों में होने लगी हैं। इन ग्रुपों में तर्क-वितर्क और टिप्पणियों से नाराजगी होने पर लोग तुरंत ‘लेफ्ट’ कर जाते हैं या एडमिन उन्हें ‘रिमूव’ कर देता है। यह स्थिति मोहल्लों के नुक्कड़ के चबूतरों के माहौल से बिल्कुल अलग है, जहां मान-मनुहार और दोस्ती की मिठास बनाए रखने के लिए साथी कंधे पर हाथ रखकर समझा देते थे। आज सोशल मीडिया पर दोस्तों की बड़ी कनेक्टिविटी है, लेकिन चर्चा करते समय व्यक्ति अकेला ही बैठा होता है। जबकि पहले चार दोस्तों की चौकड़ी में बात से बात निकलती और माहौल जीवंत हो जाता। मोहल्ले के नुक्कड़ पर बैठकर गपशप करने से सामाजिक जुड़ाव और आत्मीयता का भाव मजबूत होता था, जो अब आभासी दुनिया में कहीं खो गया है। संचार क्रांति ने निश्चित रूप से सुविधाएं दी हैं, देश-दुनिया की खबरें पलभर में मिल जाती हैं, दूर बैठे मित्रों से तुरंत संवाद हो जाता है। लेकिन इसके साथ ही सोशल मीडिया के दर्जनों प्लेटफॉर्म ने मोहल्लों के चबूतरों की रौनक छीन ली है। अब दोस्ती की चौपालें मोबाइल स्क्रीन पर सिमट गई हैं, जहां मानवीय स्पर्श और आत्मीयता की जगह डिजिटल इमोजी और ग्रुप नोटिफिकेशन ने ले ली है। सोशल मीडिया ने संवाद को आसान बनाया है, लेकिन गली-मोहल्लों की चौपालों की आत्मीयता और दोस्ती की मिठास अब आभासी दुनिया में खोने लगी है।
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एक मोहल्ले में चबूतरे पर बैठ बात करते व सोशल मीडिया पर चैटिंग में व्यस्त लोग। (एआई)