राजस्थान में पंचायती राज व्यवस्था लागू होने के बाद गठित गांवों की सरकार ने गांवों में विकास कार्यों को रफ्तार दी है, शहरी सरकार के सहयोग से गांवों में विकास कार्य कराए जा रहे हैं।
जयपुर। राजस्थान में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था गांवों में जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को बढ़ावा देने का काम कर रही है। देश के ग्रामीण अंचलों में राजनीतिक शक्ति के विकेंद्रीकरण को लेकर संविधा में संशोधन के बाद त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था को अंगीकार किया गया। पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने राजस्थान के नागौर जिले में पंचायती राज व्यवस्था का उद्घाटन किया था।
देश में ग्रामीण स्थानीय स्वशासन और विकास प्रणाली को पंचायती राज कहा जाता है। इसे देश के सभी राज्यों में राज्य विधानमंडल अधिनियमों द्वारा जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को बढ़ावा देने के लिए स्थापित किया गया था। इसे 1992 के 73वें संविधान संशोधन अधिनियम पारित कर संविधान में शामिल किया गया था।
1992 का 73वाँ संशोधन अधिनियम, जो 24 अप्रैल, 1993 को लागू हुआ, ने पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया, जो जमीनी स्तर पर राजनीतिक शक्ति के विकेंद्रीकरण के इतिहास में एक महत्वपूर्ण समय था। इस उपलब्धि को लेकर ही पंचायती राज मंत्रालय की ओर से हर साल 24 अप्रैल को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस दिवस मनाया जाता है।
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 2 अक्टूबर 1959 को राजस्थान के नागौर जिले में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था का उद्घाटन किया था। राजस्थान पंचायती राज की त्रिस्तरीय व्यवस्था लागू हुई।
राजस्थान में पंचायती राज व्यवस्था को लागू करने में, बलवंत राय मेहता को इसके जनक के रूप में माना जाता है। 1957 में योजना आयोग ने सामुदायिक विकास कार्यक्रम और राष्ट्रीय विस्तार सेवा कार्यक्रम के अध्ययन के लिए बलवंत राय मेहता समिति का गठन किया गया था। समिति ने अपनी रिपोर्ट में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू करने की सिफारिश की। जिसमें ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद शामिल किए गए।