जयपुर

Rajasthan Election 2018: चुनाव लडऩे वाले दल सात गुना बढ़े, पर जीतने वाले रह गए आधे

भारतीय लोकतंत्र के नीति-निर्माताओं ने जनता के उचित प्रतिनिधित्व के लिए बहु-दलीय व्यवस्था को चुना।

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Nov 05, 2018

मनीष शर्मा/जयपुर। भारतीय लोकतंत्र के नीति-निर्माताओं ने जनता के उचित प्रतिनिधित्व के लिए बहु-दलीय व्यवस्था को चुना। शुरुआती दौर में तो यह भावना सही साबित होती दिखी लेकिन पिछले कुछ दशकों के आंकड़ों पर नजर डालें तो अब आशंकाएं उभरने लगी हैं।

राजस्थान पत्रिका ने प्रदेश में पिछले 51 साल में हुए चुनावों के आंकड़ों को खंगाला तो सामने आया कि चुनाव लडऩे वाले दलों की तादाद तो कई गुना बढ़ती गई लेकिन जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले दलों की संख्या तुलनात्मक रूप से उतनी ही तेजी के साथ घट गई।

भले ही राजनीतिक दलों की बढ़ी तादाद स्वस्थ लोकतंत्र की परिचायक है पर ज्यादातर दलों का चुनाव हारना भी सोचने पर मजबूर करता है। देश और कई प्रदेशों के चुनावी समीकरण देखकर लगता है कि कहीं हम भी धीरे-धीरे द्वि-दलीय व्यवस्था की ओर तो नहीं बढ़ रहे!


2003 में सबसे ज्यादा दलों के विधायक बने
पिछले 51 साल में सिर्फ 2003 में ही ऐसा मौका आया जब सबसे ज्यादा राजनीतिक दलों के विधायक चुनकर विधानसभा पहुंचे। इस साल 200 सीटों पर 34 दल चुनावी रण में उतरे और 76 फीसदी को एक भी सीट नहीं मिली। अगले ही चुनाव, 2008 और 2013 में सफल दलों की संख्या भी घट गई।

03 बार सबसे कम दलों को मिली सफलता
1977, 1990 और 1993 के चुनावों में सबसे कम यानी चार-चार दलों को ही सफलता मिल पाई। 1977 में 07 दलों ने, 1990 में 25 तो 1993 में 26 दलों ने चुनावी मैदान में ताल ठोकी। तीनों बार क्रमश 43त्न, 84त्न और 85 फीसदी दलों का एक भी विधायक नहीं चुना गया।

03 बार सफल रहे सात-सात दल
1962, 1980 और 2008 में यानी तीन बार सात-सात दलों के विधायक सदन पहुंचे। 1962 में आठ, 1980 में 11 और 2008 में 42 दलों के उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा था। 1962, 1980 में 12%, 36% और 2008 में 83 फीसदी दल विफल रहे।

दो दलों के हाथ सत्ता स्वच्छ राजनीति में बाधा!
राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात जैसे कई प्रदेशों में चुनावी समीकरण देखें तो भाजपा व कांग्रेस ही लंबे समय से शासन कर रहे हैं। यानी अप्रत्यक्ष रूप से यहां द्वि-दलीय व्यवस्था बनती जा रही है। जनता के सामने मजबूत विकल्प न होने से वह बारी-बारी दोनों दलों को मौका देती है।

यहां सिर्फ चुनावी दौर में ही तीसरे मोर्च की कोशिशें होती हैं। ये चुनाव के बाद जीतने वाले दल के साथ जा मिलते हैं। राजस्थान में बसपा और राजपा ऐसा कर चुके हैं। 2008 में बसपा विधायक कांग्रेस के साथ जा मिले तो 2013 में राजपा के विधायक भाजपा में शामिल हो गए।

7 गुना ज्यादा दल चुनाव में, 91 फीसदी विफल
1962 से 2013 तक चुनाव लडऩे वाले दलों की तादाद तो 07 गुना बढ़ी पर प्रतिनिधित्व करने वाले दलों का आंकड़ा दहाई से कम रहा। 1962 में 08 दलों ने प्रदेश में ताल ठोकी थी और 07 यानी 88 फीसदी दल कामयाब रहे। 14वीं विधानसभा के चुनाव में 57 दल मैदान में उतरे, महज 05 दलों के विधायक चुने गए। यानी 91 फीसदी दलों को तो एक भी सीट नहीं मिली। राजनीति में अपराधीकरण और भ्रष्टाचार की व्यवस्था भी संस्थागत होने के पीछे दो दलों का हावी होने बड़ा कारण रहा है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जरूरी है कि जनता के सामने कई विकल्प मौजूद हों, जो इन दलों को चुनौती दे सकें।


दलों की गंभीरता पर सवाल
51 साल में विफल होने वाले दलों की बढ़ती तादाद इस ओर इशारा करती है कि वे मतदाता को रिझाने में नाकाम रहे हैं। राजनीतिक दलों के लिए यह स्थिति उनकी गंभीरता पर सवालिया निशान लगाती है। इनमें कई दल ऐसे होते हैं जो पांच साल जनता में रहने के बजाय सिर्फ चुनाव में ही नजर आते हैं।

कुछ वोट कटुआ दल किसी दल विशेष से पैसे लेकर चुनाव में उतर जाते हैं तो कुछ बागी अपनी पार्टी खड़ी कर चुनाव लडऩे लगते हैं। जनता के समक्ष ये न तो व्यावहारिक विकल्प बनते हैं न ही संघर्ष करने की क्षमता इनमें मतदाता को नजर आती है इसलिए इनका खारिज होना स्वाभाविक है।

चुनावों में पार्टी अहम, उम्मीदवार हुआ गौण
स्थानीय उम्मीदवार गौण हो गया है।
अब राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव एक चेहरे पर चुनाव लड़ा जाने लगा है। जनता के सामने एक खास मुद्दे को एजेंडा बना पेश किया जाता है और आस होती है, मतदाता उस चेहरे पर वोट करे। 2013 के बाद भाजपा ने राज्यों में नरेंद्र मोदी के चेहरे पर वोट मांगेा।

वहीं कांग्रेस में भी राहुल गांधी या संबंधित राज्य के एक चेहरे को सामने रखकर चुनाव लड़ा जाता है। इस बीच मतदाता के सामने उसके क्षेत्र के उम्मीदवार की हैसियत गौण हो जाती है जबकि स्थानीय स्तर पर तो जनता का नेतृत्व उसी के हाथों होता है। इसलिए जरूरी है कि मतदाता अपने स्थानीय उम्मीदवार पर ज्यादा गौर करें न कि आलाकमान या केंद्रीय नेतृत्व में बैठे चेहरों पर।

Published on:
05 Nov 2018 09:15 pm
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