
जयपुर। 'फैशन सिर्फ रैंप पर वॉक करने या सुंदर दिखने का जरिया नहीं, बल्कि समाज और प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने का एक सशक्त मंच है।' जयपुर की फैशन डिजाइनर और ज्वेलरी क्रिएटर प्रज्ञा टिबरीवाल ने अपनी अनूठी सोच से इस बात को सच साबित कर दिखाया है। बचपन में जिन नन्हीं उंगलियों ने अपनी गुड़ियों को रंग-बिरंगे कपड़ों से सजाना शुरू किया था, आज वही कलात्मक हाथ भारत की लुप्तप्राय वन्यजीव विरासत और राष्ट्रीय पशु 'बाघ' को सहेजने के लिए 'सेव द टाइगर' अभियान की बुलंद आवाज बन चुके हैं। प्रज्ञा ने पर्यावरण संरक्षण को लग्जरी के साथ जोड़कर फैशन की दुनिया में एक नई क्रांति की शुरुआत की है।
सीकर में जन्मी प्रज्ञा के भीतर रंगों, कपड़ों और नए डिज़ाइनों के प्रति लगाव बचपन से ही था। खेल-खेल में गुड़ियों के लिए कपड़े डिजाइन करने का उनका यही जुनून समय के साथ उनके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा बन गया। जयपुर में शादी के बाद उन्होंने अपने इसी शौक को अपना पेशा बनाया। लेकिन प्रज्ञा की सोच पारंपरिक फैशन से कहीं आगे थी। वे अपनी कला के जरिए कुछ ऐसा करना चाहती थीं जो सीधे मिट्टी और प्रकृति से जुड़ा हो।
प्रज्ञा कहती हैं कि जब खादी, ब्लॉक प्रिंट, बंधेज और लहरिया पर काम करते हैं, तो प्रकृति के प्रति हमारी संवेदनशीलता खुद-ब-खुद बढ़ जाती है। इसी वजह से प्रोजेक्ट 'वाइल्ड एलिगेंस – टाइगर कंजर्वेशन कलेक्शन'का जन्म हुआ है। यह कलेक्शन केवल फैशन और लग्जरी तक सीमित नहीं है, बल्कि 'सेव द टाइगर' अभियान को मजबूत करने की एक सार्थक और अनूठी पहल है। पहली बार परिधानों और आभूषणों को एक ही थीम के साथ प्रस्तुत किया गया है। शैडोज इन द कैनोपी (परिधान) में ऑर्गेनिक सिल्क, हैंडलूम कॉटन और इको-फ्रेंडली लिनेन पर हैंड-पेंटेड बाटिक और बारीक कढ़ाई के जरिए बाघों की धारियों और जंगल के वातावरण को उकेरा गया है। वहीं गार्डियंस ऑफ द वाइल्ड (ज्वेलरी) में रिसाइकल चांदी और 18 कैरेट गोल्ड से बने 'आई ऑफ द टाइगर' पेंडेंट और 'स्ट्राइप्स कफ' जैसे आभूषण बाघ के साहस और शक्ति को दर्शाते हैं।
प्रज्ञा कहती हैं, जब कोई व्यक्ति इस कलेक्शन का हिस्सा पहनता है, तो वह केवल फैशन नहीं अपनाता, बल्कि बाघ संरक्षण के अभियान का भागीदार बनता है। बाघों के संरक्षण के बाद वे जल्द ही भारत के राष्ट्रीय पक्षी मोर की सुंदरता और संरक्षण पर आधारित अपना नया कलेक्शन प्रस्तुत करने की तैयारी में हैं।