राजस्थान विधानसभा का बजट सत्र अपनी पूरी गर्माहट के साथ जारी है। सोमवार को सदन में उस वक्त अजीबोगरीब स्थिति पैदा हो गई जब सरकार की ओर से महत्वपूर्ण बिल पेश किए जा रहे थे, लेकिन सत्ता पक्ष के ही अधिकांश विधायक सदन से नदारद दिखे।
राजस्थान विधानसभा में सोमवार को बजट सत्र के दौरान उस समय नाटकीय घटनाक्रम देखने को मिला जब महत्वपूर्ण विधेयक पेश करते समय सत्ता पक्ष (BJP) के विधायकों की संख्या काफी कम नजर आई। कांग्रेस ने इसे सरकार की लापरवाही और सदन के प्रति गैर-जिम्मेदाराना रवैया बताते हुए तुरंत वोटिंग (Division) की मांग कर दी। स्थिति को भांपते हुए कई भाजपा विधायक दौड़कर सदन के भीतर पहुंचे, जिससे काफी देर तक हंगामे की स्थिति बनी रही।
संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल 'जन विश्वास संशोधन बिल' सदन की टेबल पर रखने के लिए खड़े हुए। नियमानुसार, जब स्पीकर ने वॉयस वोटिंग (ध्वनि मत) के जरिए बिल रखने की अनुमति माँगी, तो विपक्ष ने इस पर आपत्ति जता दी।
नेता प्रतिपक्ष (कांग्रेस) ने खाली कुर्सियों की ओर इशारा करते हुए कहा कि सदन में भाजपा के विधायकों की संख्या बहुत कम है और सरकार बहुमत में नहीं दिख रही है। उन्होंने वॉयस वोटिंग के बजाय डिवीजन (पर्चियों या मशीन से वोटिंग) की मांग की, ताकि यह साफ हो सके कि बिल पेश करने के लिए सरकार के पास पर्याप्त विधायक हैं या नहीं।
जैसे ही कांग्रेस ने वोटिंग की मांग पर दबाव बनाया, सत्ता पक्ष के खेमे में खलबली मच गई। लॉबी और गैलरी में मौजूद कई भाजपा विधायक आनन-फानन में दौड़ते हुए सदन के भीतर अपनी सीटों पर पहुंचे। स्पीकर पहले ही बिल को सदन में रखने की मंजूरी दे चुके थे, लेकिन हंगामे के कारण कार्यवाही कुछ देर के लिए बाधित हुई।
हंगामा शांत होने के बाद सरकारी मुख्य सचेतक जोगेश्वर गर्ग ने कांग्रेस के रवैये पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच एक-दूसरे का सहयोग करने की पुरानी परंपरा रही है।
गर्ग ने सफाई दी कि नेता प्रतिपक्ष स्वयं कांग्रेस की किसी बैठक में व्यस्त थे, जिसके सम्मान में BAC (Business Advisory Committee) की बैठक का समय दोपहर 1 बजे से बदलकर 3 बजे किया गया था। उन्होंने कहा कि विधायकों के कुछ मिनट देरी से आने के मुद्दे को बेवजह बड़ा बनाना ठीक नहीं है।
इस घटना ने राजस्थान सरकार के 'फ्लोर मैनेजमेंट' पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष का आरोप है कि सरकार गंभीर विधेयकों को लेकर संवेदनशील नहीं है। वहीं, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बजट सत्र के दौरान सत्ता पक्ष के विधायकों की अनुपस्थिति सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकती है, खासकर तब जब विपक्ष हर छोटे मौके को बड़े मुद्दे में बदलने के लिए तैयार बैठा है।