
जयपुर। प्रदेश में पिछले दस साल रहे कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही दलों के शासन में सेहत के सूचकांकों में तो खासी तरक्की हुई है, लेकिन सूबे में हर साल गर्भवती महिलाओं और बच्चों की बड़ी संख्या में मौतों का सिलसिला अब भी बरकरार है।
प्रदेश में हर साल करीब 4600 माताओं और 5 साल से कम आयु के करीब 70 हजार शिशुओं की मृत्यु हो रही है। हालांकि पिछले दो शासन से मातृ मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर, कुपोषण और लिंगानुपात के प्रमुख मापदंडों की बात करें तो प्रदेश की स्थिति में सुधार हुआ है।
पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार और मौजूदा भाजपा सरकार की बात करें तो दोनो ही सरकारों ने जनता को सेहत से जुडी मुफ्त दवा, जांच और भामाशाह स्वास्थ्य बीमा जैसी बड़ी योजनाएं दी। भारत में गरीब राज्यों को आधिकारिक तौर पर एम्पावर्ड एक्शन ग्रुप (ईएजी) कहा जाता है। राजस्थान इनमें शामिल है। अन्य राज्यों में बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, उत्तरांचल और उत्तर प्रदेश शामिल है।
शिशु लिंगानुपात 34 अंका सुधरा
बीते वर्षों में प्रदेश में 0 से 6 वर्ष के शिशु लिंगानुपात में 34 अंकों की बढ़ोतरी हुई है। 888 से बढ़कर यह आंकड़ा अब 922 हो गया है। हालांकि 4 जिलों में शिशु लिंगानुपात में गिरावट भी देखी गई है। सबसे अधिक बढोत्तरी हनुमानगढ में 75 अंकों की एवं सबसे कम कोटा में 1 अंक की बढ़ोतरी हुई है। दूसरी ओर, डूंगरपुर में शिशु लिंगानुपात 922 से घटकर 900 रह गया। उदयपुर में 12, प्रतापगढ व बीकानेर में भी 4-4 अंको की गिरावट आई है।
डिकॉय से सुधरे हालात
कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए राजस्थान ने डिकॉय ऑपरेशन के लिहाज से देश में सबसे बेहतरीन राज्यों में शामिल है। प्रदेश में अब तक 125 से अधिकडिकॉय किए जा चुके हैं। साथ ही 37 अंतरराज्यीय कार्यवाही की गई है। पीसीपीएनडीटी एक्ट के तहत किए गए डिकॉय ऑपरेशनों के कारण बालिका लिंगानुपात में अधिक सुधार हुआ है।
46.8 प्रतिशत महिलाएं एनिमिक
राजस्थान में 6-59 महीने के बच्चों में से लगभग 60.3 प्रतिशत बच्चे एनीमिया के शिकार है। जबकि 36.7 प्रतिशत बच्चों का वजन उम्र के अनुसार प्रमाणित वजन से कम पाया गया है। राज्य में 15-49 साल की महिलाओं में से लगभग 46.8 प्रतिशत महिलाएं एनिमिक हैं। 2015-16 में संचालित सी-मेम पोषण कार्यक्रम में बारां समेत 13 जिलों में अब तक करीब 2.34 लाख बच्चों की स्क्रीनिंग की गई एवं 10 हजार बच्चों को कुपोषण मुक्त करने का दावा सरकार ने किया है।
कोशिशें बहुत की, पर नतीजे अब भी धीमे
पिछले एक दशक के दौरान राजस्थान के चिकित्सा ढांचे में सुधार की रफ्तार कमोबेश धीमी ही रही। इसी साल प्रदेश में पांच नए सरकारी मेडिकल कॉलेज तो शुरू हुए, लेकिन यह सफलता पिछले छह साल की मशक्कत का परिणाम है। इन कॉलेजों में आज भी फेकल्टी व संसाधनों की समस्या सामने आ रही है। पिछली सरकार ने निशुल्क दवा व जांच योजना शुरू कर जनता को महंगे इलाज से राहत दी तो इस सरकार ने भी स्वास्थ्य क्षेत्र में भामाशाह योजना प्रदेश को दी। दोनों योजनाओं में 1600 करोड़ का खर्च हुआ, लेकिन बडे सरकारी अस्पतालों में मरीजों का दबाव कम करने की कोई योजना अब तक कारगर नहीं। इस समय प्रदेश में 38 हजार से अधिक डॉक्टर उपलब्ध हैं, लेकिन सरकार के पास सरकारी अस्पतालों में आठ हजार डॉक्टर भी नहीं हैं।
शिशु मृत्यु दर (प्रति एक हजार जीवित जन्मों पर)
वर्ष----- ग्रामीण----- शहरी----- कुल
2007----- 72 -----40----- 65
2013----- 52----- 27 -----46
2017----- 45----- 30----- 41
मातृ मृत्यु दर
2004-06 - 388
2007-09 -ं 318
2010-2012 - 255
2011-13 - 244
2014-16 - 199
(प्रति एक लाख जीवित जन्म पर)
हमारी सरकार ने भामाशाह बीमा योजना में 25 लाख लोगों को गुणात्मक उपचार निजी अस्पतालों में दिया है। आदर्श पीएचसी की स्थापना से गांवों में भी बेहतर इलाज की शुरूआत की है। आईएमआर और एमएमआर में भी सुधार हुआ है। डॉक्टर, नर्सेज और पैरामेडिकल सहित तमाम संवर्गों की बंपर भर्तियां की है। कन्या भ्रूण हत्या रोकथाम के लिए पीसीपीएनडीटी का काम जैसा राजस्थान ने किया, देश के किसी राज्य ने नहीं किया। भविष्य में राजस्थान देश के अग्रणी राज्यों में होगा।
कालीचरण सराफ, चिकित्सा मंत्री राजस्थान
हम मानकों में कांग्रेस सरकार के समय से ही सुधार कर रहे हैं। हमारी सरकार में जो योजनाएं चली, उनकी ही बदौलत आज राजस्थान सूचकांकों में लगातार सुधार कर रहा है। अब हमें ध्यान देश में अव्वल राज्यों की श्रेणी में शामिल होने पर भी देना चाहिए। पिछले पांच सालों के दौरान यदि योजनाओं का सही तरीके से इंप्लीमेंट किया जाता, मेडिकल कॉलेज खुलने में देरी नहीं होती, निचले स्तर पर बेहतर चिकित्सा सेवाएं मुहैया होती तो आज हम और आगे होते।
राजकुमार शर्मा, पूर्व चिकित्सा राज्य मंत्री