जयपुर

आईना: व्यवस्था-ए-नागफनी बाहर हरी…भीतर खोखली

राजस्थान की व्यवस्था इन दिनों नागफनी पर टिकी है। ऊपर से हरी। अंदर से खोखली। और जरा-सी चूक में चुभने वाली। फर्क बस इतना है कि इस नागफनी की चुभन सत्ता को नहीं, जनता को लग रही है।

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Jan 16, 2026
SMS अस्पताल की ट्रोमा ICU में भरा पानी। फोटो: पत्रिका

राजस्थान की व्यवस्था इन दिनों नागफनी पर टिकी है। ऊपर से हरी। अंदर से खोखली। और जरा-सी चूक में चुभने वाली। फर्क बस इतना है कि इस नागफनी की चुभन सत्ता को नहीं, जनता को लग रही है। जयपुर के ट्रोमा सेंटर का आइसीयू पानी में डूब गया। बूंदी में स्कूल के बरामदे की छत भरभराकर गिर पड़ी। दो अलग जगहें। दो अलग विभाग। लेकिन तस्वीर एक ही।

जयपुर के ट्रोमा सेंटर में आधा फुट पानी भर गया। वही, आइसीयू, जहां जिंदगी और मौत के बीच महीन-सी रेखा होती है। वेंटिलेटर… मॉनिटर… जीवनरक्षक मशीनें। सब पानी के बीच। चौदह मरीज भर्ती थे। दस वेंटिलेटर पर। अगर करंट फैल जाता, तो यह खबर हादसे की नहीं होती। यह एक त्रासदी होती। और यह पहली बार नहीं था। इसी ट्रोमा सेंटर में पहले आग लग चुकी है। तब भी कहा गया था, जांच होगी। सुधार होगा। लेकिन हुआ क्या?

अब बूंदी आइए। सरकारी स्कूल का बरामदा गिर गया। तीस बच्चे बाल-बाल बचे। यह संयोग ही था कि ठंड के कारण बच्चे मैदान में पढ़ रहे थे। वरना तस्वीरें अलग होतीं। मलबे के नीचे दबे बच्चे। और सिस्टम का वही पुराना विलाप। यही बरामदा रोज पोषाहार के लिए इस्तेमाल होता था। सवाल सीधा है, बच्चों की सुरक्षा भी किस्मत के भरोसे है? और यह कोई पहली चेतावनी नहीं थी। झालावाड़ में स्कूल की छत गिरने से बच्चों की जान गई थी। उस सिहरन को छह महीने भी नहीं हुए। सरकार ने तब कहा था, जर्जर भवन चिह्नित कर लिए गए हैं। बच्चे वहां नहीं बैठते। लेकिन हाईकोर्ट ने उस बयान को पहचान लिया।

कहा भी, यह खानापूर्ति है। दिए गए बजट से तो रंग-रोगन भी नहीं होगा। कोर्ट ने बार-बार पूछा, रोडमैप कहां है? पूरा बजट कहां है? वैकल्पिक व्यवस्था कहां है? सरकार हर बार तारीख मांगती रही। और अफसर इंतजार करते रहे। किस आदेश का, किस संकेत का, किस हादसे का। बूंदी का स्कूल बता रहा है कि हाईकोर्ट की भावना का जमीन पर कोई असर नहीं पड़ा।

यह दो घटनाएं नहीं हैं। यह सिस्टम का रिपोर्ट कार्ड है। अस्पताल और स्कूल। जीवन और भविष्य के सबसे संवेदनशील केंद्र। और वही सबसे ज्यादा असुरक्षित। व्यवस्था धृतराष्ट्र की तरह बैठी है। आंखें बंद। कान भी बंद। न समय पर ऑडिट। न ईमानदार निरीक्षण। न जवाबदेही। चिकित्सा शिक्षा मंत्री। शिक्षा मंत्री। दोनों के विभागों पर सवाल नए नहीं हैं। लेकिन हर बार वही भाषा। वही आश्वासन। वही बयान।

सवाल यह नहीं कि बयान क्यों दिए गए। सवाल यह है, क्या मंत्री की जिम्मेदारी सिर्फ माइक तक सीमित है? क्या हादसे के बाद दौरा करना ही सुशासन है? अगर यही मानक है, तो फिर रोकथाम किस शब्दकोश में दर्ज है? खतरनाक बात यह नहीं कि हादसे हो रहे हैं। सबसे खतरनाक बात यह है कि हादसों से पहले की चेतावनियां लगातार नजरअंदाज की जा रही हैं।

जर्जर इमारतें। रिसते पाइप। घटिया निर्माण। अधूरे ऑडिट। सब दिखता है, लेकिन देखा नहीं जाता। क्योंकि देखने का मतलब है, जवाबदेही स्वीकार करना। हम ऐसी शासन व्यवस्था के आदी हो चुके हैं जहां पहले हादसा। फिर जांच। फिर फाइल। फिर सन्नाटा।

जबकि जिम्मेदार शासन वह होता है, जो हादसे को जन्म ही न लेने दे। अब सवाल सिर्फ यही है, क्या इन घटनाओं के बाद किसी की कुर्सी हिलेगी? क्या किसी अफसर की जवाबदेही तय होगी? या फिर यह दोनों मामले भी रिपोर्ट बनकर फाइलों में दफन हो जाएंगे? राजस्थान की जनता नागफनियों से अब छलनी हो चुकी है।

Published on:
16 Jan 2026 05:41 pm
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