
Rajasthan High Court : जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने मादक पदार्थों से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि केवल किसी वाहन का मालिक होने के आधार पर ही व्यक्ति को एनडीपीएस एक्ट के तहत आरोपी नहीं बनाया जा सकता। अभियोजन पक्ष को यह सिद्ध करना होगा कि वाहन मालिक को इस बात की पूर्ण जानकारी थी या उसने जानबूझकर अपने वाहन का इस्तेमाल मादक पदार्थ रखने, छिपाने या ले जाने के लिए करने की अनुमति दी थी।
न्यायाधीश अनिल कुमार उपमन की पीठ ने स्पष्ट किया कि एनडीपीएस एक्ट की धारा 25 में प्रयुक्त ‘जानबूझकर’ शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसी संपत्ति या वाहन का केवल पंजीकृत मालिक होने मात्र से यह उपधारणा करना उचित नहीं है कि उसे अपने वाहन के अवैध गतिविधियों में इस्तेमाल की जानकारी थी।
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष सबसे पहले यही साबित करने में असफल रहा कि सह-आरोपी प्रतिबंधित मादक पदार्थ को उसी विशिष्ट वाहन में ले जा रहे थे। जब परिवहन से जुड़ा यह बुनियादी तथ्य ही सिद्ध नहीं हुआ, तो केवल पंजीकृत मालिक होने के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
अभियोजन का यह दायित्व है कि वह प्रथम दृष्टया ऐसा ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करे, जिससे स्पष्ट हो कि मालिक को वाहन के इस दुरुपयोग की जानकारी थी। इसके बाद ही आपराधिक मानसिकता से जुड़ी कानूनी अवधारणा लागू हो सकती है। राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील को निरस्त करते हुए आरोपी को बरी करने के निचली अदालत के फैसले को यथावत रखा।
मामले में कार से 348 किलोग्राम मादक पदार्थ बरामद हुआ था। जांच में सामने आया कि यह वाहन आरोपी के नाम पर पंजीकृत थी, जिसके आधार पर उसे सह-आरोपी बनाया गया। हालांकि, निचली अदालत ने साक्ष्यों के आधार पर उसे बरी कर दिया। इसके खिलाफ राज्य ने हाईकोर्ट में अपील की। राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए आरोपी को बरी किए जाने के निचली अदालत का फैसला बरकरार रखा।