जयपुर

Rajasthan High Court : मर्डर केस में राजस्थान हाईकोर्ट की नई व्याख्या, अज्ञात कह फाइनल रिपोर्ट नहीं लगा सकती पुलिस

Rajasthan High Court : राजस्थान हाईकोर्ट ने हत्या से जुड़े एक मामले में कानून की महत्वपूर्ण व्याख्या की है। कहा-पुलिस केवल इस आधार पर जांच बंद नहीं कर सकती कि अज्ञात आरोपियों का पता नहीं चल पा रहा है।

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Rajasthan High Court : फाइल फोटो पत्रिका

Rajasthan High Court : राजस्थान हाईकोर्ट ने हत्या से जुड़े एक मामले में कानून की बेहद महत्वपूर्ण व्याख्या की है। अदालत ने कहा है कि पुलिस केवल इस आधार पर जांच बंद नहीं कर सकती कि अज्ञात आरोपियों का पता नहीं चल पा रहा है। 'ब्लाइंड मर्डर' जैसे मामलों में आरोपी शुरुआत में अज्ञात ही होते हैं और जांच अधिकारी का यह वैधानिक कर्तव्य है कि वह सभी प्रयास कर अपराधियों को बेनकाब करे। इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने भाषा की समझ न होने के आधार पर नार्को टेस्ट से इनकार करने को भी गलत ठहराया और मामले में पुलिस फाइनल रिपोर्ट (एफआर) को स्वीकार करने वाले निचली अदालत के आदेश को निरस्त कर दिया।

न्यायाधीश अनूप कुमार ढंढ ने यह आदेश याचिकाकर्ता फेलीराम की ओर से दायर आपराधिक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। राजस्थान हाईकोर्ट की एकलपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि नार्को टेस्ट के दौरान यदि किसी व्यक्ति को संबंधित भाषा (जैसे हिंदी) का ज्ञान नहीं है, तो इसके लिए डॉक्टरों की टीम के साथ आवश्यकतानुसार दुभाषिए की मदद ली जा सकती है। केवल भाषा की बाधा के चलते टेस्ट से मना करना न्यायसंगत नहीं है।

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6 साल बीतने के तर्क पर जताया आश्चर्य, जांच बदली

अदालत ने अनुसंधान अधिकारी की ओर से अंतिम रिपोर्ट में 'छह वर्ष से अधिक का समय बीत जाने और आरोपियों के मिलने की संभावना कम होने' के तर्क पर कड़ा आश्चर्य जताया। हाईकोर्ट ने संबंधित पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया कि मामले की फाइल किसी अन्य योग्य सीआइ स्तर के अधिकारी को सौंपी जाए, जो आवश्यकता पड़ने पर नार्को टेस्ट सहित अन्य वैज्ञानिक पद्धतियों का उपयोग कर विस्तृत जांच रिपोर्ट निचली अदालत में पेश करे।

क्या है मामला?

याचिकाकर्ता ने अपने भाई की हत्या को लेकर वर्ष 2015 में दौसा के रामगढ़ पचवारा थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई थी। आरोप है कि जांच अधिकारी ने लचर अनुसंधान करते हुए मामले में एफआर पेश कर दी। जिसे निचली अदालत ने 23 सितंबर 2022 को स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता की प्रोटेस्ट पिटीशन खारिज कर दी थी।

याचिका में आधार लिया गया कि अनुसंधान के दौरान जांच अधिकारी ने खुद नार्को टेस्ट के लिए आवेदन दिया था, जिस पर याचिकाकर्ता ने लिखित सहमति दी थी और वह आज भी इसके लिए तैयार है। ऐसे में मामले की निष्पक्ष व वैज्ञानिक जांच की जाए।

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Updated on:
31 May 2026 08:44 am
Published on:
31 May 2026 08:42 am
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