जयपुर: राजस्थान के सरकारी कॉलेजों में ‘राजसेस’ (Raj-CES) योजना के तहत की जा रही संविदा नियुक्तियों और अस्थायी संचालन व्यवस्था के खिलाफ अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (ABRSM) ने बिगुल फूंक दिया है। जयपुर स्थित आयुक्तालय कॉलेज शिक्षा इकाई के तत्वावधान में प्राध्यापकों ने एक बड़ा विरोध प्रदर्शन किया। शिक्षकों का आरोप है कि राज्य […]
जयपुर: राजस्थान के सरकारी कॉलेजों में 'राजसेस' (Raj-CES) योजना के तहत की जा रही संविदा नियुक्तियों और अस्थायी संचालन व्यवस्था के खिलाफ अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (ABRSM) ने बिगुल फूंक दिया है। जयपुर स्थित आयुक्तालय कॉलेज शिक्षा इकाई के तत्वावधान में प्राध्यापकों ने एक बड़ा विरोध प्रदर्शन किया। शिक्षकों का आरोप है कि राज्य सरकार 'नेशनल एजुकेशन पॉलिसी' (NEP-2020) की धज्जियाँ उड़ाते हुए उच्च शिक्षा को संविदा के भरोसे छोड़ रही है।
आयुक्तालय कॉलेज शिक्षा के मुख्य द्वार पर आज नजारा बदला हुआ था। प्रदेश के वरिष्ठ प्राध्यापकों ने अपनी बांहों पर काली पट्टी बांधकर और हाथों में मांगों से संबंधित प्ले-कार्ड्स लेकर मौन प्रदर्शन किया। शिक्षकों ने स्पष्ट किया कि यह विरोध केवल उनके हितों के लिए नहीं, बल्कि राजस्थान की उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को बचाने के लिए है।
महासंघ का तर्क है कि सत्र 2020-21 से अब तक प्रदेश में कुल 374 राजसेस महाविद्यालय खोले जा चुके हैं। इनमें से 260 कॉलेज ऐसे हैं जहाँ आज भी एक भी स्थायी संकाय सदस्य (Faculty) मौजूद नहीं है।
महासंघ के अनुसार, बिना स्थायी अकादमिक ढांचे, अपर्याप्त संसाधनों और शोध की कमी के चलते ये कॉलेज केवल 'डिग्री बांटने वाले केंद्र' बनकर रह गए हैं। यह व्यवस्था राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बहुविषयकता और अकादमिक निरंतरता के दावों के विपरीत है।
शिक्षकों की सबसे बड़ी आपत्ति भर्ती परीक्षा कैलेंडर-2026 को लेकर है। राज्य सरकार ने राजसेस नियम-2023 में बदलाव कर 28,500 रुपये के नियत वेतन पर संविदा 'टीचिंग एसोसिएट' और अशैक्षणिक पदों के लिए कर्मचारी चयन बोर्ड को अभ्यर्थना भेजी है।
महासंघ का कहना है कि उच्च शिक्षा में संविदा व्यवस्था असुरक्षित है और नीति-विरोधी है। इससे न तो पढ़ाने वाले का भविष्य सुरक्षित है और न ही पढ़ने वाले का।
प्रदर्शन के बाद एक प्रतिनिधिमंडल ने उपखंड अधिकारी और जिला कलेक्टर के माध्यम से मुख्यमंत्री, राज्यपाल और प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में उल्लेख किया गया कि विधानसभा चुनाव-2023 के बाद गठित सोडाणी समिति की सिफारिशों को सरकार दबाकर बैठी है। महासंघ ने मांग की कि इस समिति की रिपोर्ट को तुरंत सार्वजनिक किया जाए और इसकी सिफारिशों को लागू किया जाए।
महासंघ ने सरकार के सामने मुख्य मांगें रखी हैं: